जयपुर | संविधान के 73वें संशोधन के 33 वर्ष पूरे होने के बाद भी देश के कई राज्यों में पंचायतों के चुनाव समय पर नहीं हो रहे हैं। केंद्र सरकार के अनुसार, 8 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया बाधित है। राजस्थान सहित कई राज्यों में पंचायत चुनाव की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है, जहां चुनाव 4 से 5 साल पहले ही ड्यू हो चुके हैं। लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी की जा रही है।
राजनीतिक घमासान और देरी के कारण
राजस्थान में भाजपा सरकार है, जबकि कांग्रेस इस देरी के लिए सत्तापक्ष को जिम्मेदार ठहरा रही है। हकीकत यह है कि देरी वाले राज्यों में कांग्रेस शासित प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्य भी शामिल हैं। केंद्र ने स्पष्ट किया है कि इस देरी का 'वन नेशन, वन इलेक्शन' योजना से कोई संबंध नहीं है। पुडुचेरी में तो जुलाई 2011 के बाद से ग्राम पंचायत चुनाव आयोजित ही नहीं किए गए हैं।
संवैधानिक प्रावधान और जमीनी हकीकत
73वां संविधान संशोधन 1992 में पारित हुआ था और 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ था। इसी ऐतिहासिक दिन की याद में हर साल 'राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस' मनाया जाता है।
"पंचायतों को सशक्त बनाना लोकतंत्र की नींव को मजबूत करना है, लेकिन चुनाव में देरी इस उद्देश्य को कमजोर करती है।"
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में भी प्रशासनिक कारणों से चुनाव प्रक्रिया अटकी हुई है। लक्षद्वीप में दिसंबर 2022 से ग्राम पंचायत और जिला पंचायत के चुनाव लंबित पड़े हुए हैं।
प्रमुख नेताओं का पंचायती राज से नाता
राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली जैसे दिग्गज नेता इसी व्यवस्था की उपज रहे हैं। गोविन्द सिंह डोटासरा और झाबर सिंह खर्रा भी पंचायती राज संस्थाओं के प्रतिनिधि रह चुके हैं। उत्तर प्रदेश में भी 57,695 ग्राम पंचायतों का कार्यकाल मई में समाप्त होने वाला है, जिसका मामला अब हाईकोर्ट पहुंच गया है। अब यह देखना होगा कि संवैधानिक बाध्यता का पालन कब तक सुनिश्चित हो पाता है।
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