ज़िंदगानी

अरावली बचाने की जंग: सिरोही में 800 हेक्टेयर खनन परियोजना के खिलाफ सड़कों पर उतरा जनसैलाब

गणपत सिंह मांडोली · 24 जनवरी 2026, 05:18 शाम
सिरोही में प्रस्तावित चूना पत्थर खनन परियोजना के खिलाफ हजारों ग्रामीणों ने पदयात्रा निकाली। जल, जंगल और जमीन बचाने के लिए जनता अब आर-पार की लड़ाई के मूड में है।

सिरोही | राजस्थान के सिरोही जिले में इन दिनों फिजाओं में इंकलाब की गूंज है। यह गूंज किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी, अपने पानी और अरावली की सदियों पुरानी पहाड़ियों को बचाने के लिए है। अरावली पर्वत श्रृंखला को विनाशकारी खनन से बचाने के लिए एक बार फिर जनआंदोलन तेज हो गया है। जिले में मेसर्स कमलेश मेटाकास्ट प्राइवेट लिमिटेड की प्रस्तावित 800 हेक्टेयर की चूना पत्थर खनन परियोजना के खिलाफ ग्रामीणों का आक्रोश अब सड़कों पर सैलाब बनकर उमड़ पड़ा है।

जल, जमीन और जंगल के लिए पदयात्रा

शनिवार को हजारों की संख्या में ग्रामीणों ने इस खनन परियोजना को निरस्त करने की मांग को लेकर एक विशाल जनजागृति पदयात्रा निकाली। यह पदयात्रा केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को बचाने की एक पुकार थी। पदयात्रा की शुरुआत भारजा गांव से हुई, जो तरूंगी, भीमाना, वाटेरा और रोहिड़ा जैसे गांवों से गुजरते हुए शाम को स्वरूपगंज पहुंची। रास्ते भर लोगों का जोश देखते ही बनता था। ग्रामीणों का एक ही संकल्प है—अरावली की पहाड़ियों को छलनी नहीं होने देंगे।

चुनावी रैली नहीं, यह जनता की पीड़ा है

इस आंदोलन की सबसे मर्मस्पर्शी बात यह रही कि इसमें शामिल बुजुर्ग, युवा और महिलाएं अपने घरों से 'लुकी-सूखी' रोटियां, अचार और चटनी साथ लेकर आए थे। दोपहर की चिलचिलाती धूप में सड़क किनारे बैठकर सादगी से भोजन करते इन लोगों को देखकर यह साफ था कि यह कोई प्रायोजित चुनावी रैली नहीं है। यह उन लोगों की वास्तविक पीड़ा है, जिन्हें डर है कि अगर यह खनन शुरू हुआ तो उनके जल स्रोत सूख जाएंगे, खेती की जमीन बंजर हो जाएगी और जिस जंगल से उनका जीवन चलता है, वह इतिहास बन जाएगा।

प्रशासनिक दबाव पर भारी जनसमर्थन

आंदोलनकारियों का आरोप है कि प्रशासन इस शांतिपूर्ण आंदोलन को दबाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन ग्रामीणों के हौसले बुलंद हैं। रैली में उमड़े जनसैलाब ने सरकार को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि वे सरकारी दमन से डरने वाले नहीं हैं। पदयात्रा के दौरान गांव-गांव में लोगों ने फूल-मालाओं और स्वागत गीतों के साथ आंदोलनकारियों का हौसला बढ़ाया। बाजारों में व्यापारियों और आम जनता ने इस लड़ाई को अपनी लड़ाई मानकर समर्थन दिया है।

अरावली: राजस्थान की जीवन रेखा

आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि अरावली केवल पहाड़ नहीं है, यह राजस्थान की जीवन रेखा है। यही पहाड़ मानसून को रोकते हैं और भूजल स्तर को बनाए रखते हैं। यदि 800 हेक्टेयर में खनन की अनुमति दी गई, तो पूरा पारिस्थितिकी तंत्र तबाह हो जाएगा। ग्रामीणों ने सरकार से पुरजोर अपील की है कि कमलेश मेटाकास्ट की इस परियोजना को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए, वरना यह आंदोलन आने वाले समय में और भी उग्र रूप धारण करेगा।

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