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पैड की पीड़ा

नीलू शेखावत · 16 अक्टूबर 2022, 11:35 दोपहर
वह परेशानी जिससे बड़ी उम्र की कामकाजी महिलाएं तक डील नहीं कर पातीं,ये मासूम बच्चियां सयानेपन से छिपा ले जाती हैं। पर ये छिपाव जब समझे बूझे लोगों की उपेक्षा और व्यंग्य का साधन बन जाए तो चर्चा कर लेना श्रेयस्कर है। तो चलिए बात को बिंदुवार समझते हैं

इन दिनों एक आला दर्जे की अफसर साहिबा ने सिनेटरी पैड को इतना पॉपुलर कर ही दिया है तो सोचा इस पर धरातल से बात की जाए।यह बात सिर्फ और सिर्फ गांव की बच्चियों व सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाली बच्चियों की है क्योंकि यह मेरा भोगा और देखा हुआ यथार्थ है।

औसत  दस से ग्यारह की उम्र में बच्चियों को माहवारी शुरू हो जाती है और तब वे छठवीं या सातवीं कक्षा में पढ़ रही होती हैं।आप इन कक्षाओं में पढ़ने वाली बच्चियों से मिलेंगे तो सहसा यकीन नहीं कर पाएंगे कि घेर कुर्ते पहनकर चिड़ियाओं की तरह फुदकने वाली ये बच्चियां हर माह माहवारी जैसी परेशानी को झेल रहीं हैं। (फॉर गॉड सैक अब यह मत कह दीजिए कि यह तो ईश्वर का वरदान है स्त्री के लिए। कम से कम गांव की बच्चियों के लिए तो अगले दस वर्ष तक यह यंत्रणा के अतिरिक्त कुछ नहीं।)

वह परेशानी जिससे बड़ी उम्र की कामकाजी महिलाएं तक डील नहीं कर पातीं,ये मासूम बच्चियां सयानेपन से छिपा ले जाती हैं। पर ये छिपाव जब समझे बूझे लोगों की उपेक्षा और व्यंग्य का साधन बन जाए तो चर्चा कर लेना श्रेयस्कर है। तो चलिए बात को बिंदुवार समझते हैं

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