गोंडा |
सावन के पवित्र महीने में देशभर के शिव मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है। इसी बीच, उत्तर प्रदेश का एक अनोखा शिव मंदिर हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है, जहां मौजूद शिवलिंग का अधिकांश हिस्सा आज भी जमीन के नीचे है।
पृथ्वीनाथ मंदिर का रहस्य: 79 फीट का शिवलिंग
उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में स्थित पृथ्वीनाथ मंदिर अपनी अनूठी विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध है। यहां एशिया का सबसे बड़ा शिवलिंग स्थापित है, जो भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
एशिया का सबसे बड़ा शिवलिंग
इस मंदिर की सबसे खास बात यहां मौजूद विशाल शिवलिंग है। यह शिवलिंग जमीन के ऊपर 15 फीट तक दिखाई देता है, जबकि इसका 64 फीट का हिस्सा जमीन के नीचे दबा हुआ है। इस प्रकार, यह एशिया का सबसे बड़ा शिवलिंग माना जाता है।
5000 साल पुराना है इतिहास
पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, यह शिवलिंग अत्यंत प्राचीन है। माना जाता है कि यह लगभग 5000 वर्ष पुराना है और इसका संबंध महाभारत काल से है। सावन के महीने में इसकी महिमा और भी बढ़ जाती है।
महाभारत से जुड़ा है मंदिर का संबंध
इस मंदिर को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, जो इसे सीधे द्वापर युग से जोड़ती हैं। माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना पांडवों द्वारा की गई थी।
भीम ने क्यों की थी शिवलिंग की स्थापना?
एक प्रचलित मान्यता के अनुसार, पांडवों के अज्ञातवास के दौरान, भीम ने बकासुर नामक राक्षस का वध किया था। इस वध के कारण उन पर ब्रह्महत्या का दोष लग गया। इस दोष से मुक्ति पाने के लिए, भीम ने इस विशाल शिवलिंग की स्थापना की और भगवान शिव की पूजा की।
कैसे पड़ा 'पृथ्वीनाथ' नाम?
कहा जाता है कि समय के साथ भीम द्वारा स्थापित यह शिवलिंग धीरे-धीरे जमीन में समा गया। सदियों बाद, खरगूपुर के राजा मानसिंह की अनुमति से पृथ्वीनाथ सिंह नामक एक व्यक्ति ने अपने मकान के निर्माण के लिए उस स्थान पर खुदाई शुरू की।
खुदाई के दौरान पृथ्वीनाथ सिंह को एक सपना आया, जिसमें उन्हें बताया गया कि उस जमीन के नीचे सात खंडों का एक विशाल शिवलिंग दबा हुआ है। सपने के बाद जब खुदाई की गई, तो वहां सचमुच शिवलिंग मिला। इसके बाद से ही इस मंदिर का नाम पृथ्वीनाथ मंदिर पड़ गया।
सावन में विशेष महत्व
सावन और चातुर्मास के दौरान इस मंदिर का महत्व और भी बढ़ जाता है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं, तो भगवान शिव ही सृष्टि का संचालन करते हैं।
कैसे करते हैं भक्त जलाभिषेक?
इस शिवलिंग पर जलाभिषेक करने का विशेष विधान है। शिवलिंग की ऊंचाई अधिक होने के कारण, भक्तों को एड़ी उठाकर ही जलाभिषेक करना पड़ता है। मान्यता है कि यहां दर्शन मात्र से ही भक्तों के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।
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