क्राइम

400 करोड़ की डिजिटल ठगी: राजस्थान में डिजिटल सिग्नेचर से 400 करोड़ की महाठगी: चार्टर्ड अकाउंटेंट पुलिस के रडार पर, दुबई तक जुड़े गिरोह के तार

thinQ360 · 08 अप्रैल 2026, 05:16 शाम
जयपुर पुलिस ने डिजिटल हस्ताक्षर जालसाजी के जरिए 400 करोड़ रुपये की ठगी का खुलासा किया है। इस गिरोह के तार दिल्ली और दुबई से जुड़े हैं, जिसमें कई सीए की भूमिका संदिग्ध है।

जयपुर | राजस्थान की राजधानी जयपुर से एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां पुलिस ने एक ऐसे गिरोह का भंडाफोड़ किया है जिसने डिजिटल सिग्नेचर का इस्तेमाल कर करोड़ों की ठगी की है।

शुरुआती जांच में यह ठगी 400 करोड़ रुपये से अधिक की बताई जा रही है। जयपुर पुलिस कमिश्नरेट इस पूरे प्रकरण की गहराई से जांच कर रहा है।

इस घोटाले में दिल्ली की एक व्यावसायिक संस्था और कई चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) की भूमिका संदिग्ध मानी जा रही है। पुलिस अब इन सभी कड़ियों को जोड़ने में जुटी है।

कैसे सामने आया महाघोटाला?

पुलिस को लंबे समय से डिजिटल हस्ताक्षरों के दुरुपयोग की शिकायतें मिल रही थीं। जांच के दौरान पता चला कि करीब 400 लोगों के फर्जी डिजिटल सिग्नेचर तैयार किए गए थे।

इन फर्जी हस्ताक्षरों का उपयोग कर विभिन्न व्यावसायिक संस्थाओं के बैंक खातों से करोड़ों रुपये निकाल लिए गए। यह खेल बेहद शातिर तरीके से खेला जा रहा था।

जयपुर पुलिस ने इस मामले में अब तक पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है। इन आरोपियों से पूछताछ में कई बड़े खुलासे होने की उम्मीद जताई जा रही है।

दुबई से जुड़ा है ठगी का कनेक्शन

पुलिस की जांच में एक अंतरराष्ट्रीय लिंक भी सामने आया है। पता चला है कि ठगी का पैसा दिल्ली के रास्ते दुबई भेजा जा रहा था।

गिरोह के निचले स्तर के गुर्गों को केवल एक से दो लाख रुपये ही दिए जाते थे। जबकि ठगी की मुख्य राशि विदेशी खातों में ट्रांसफर कर दी जाती थी।

पुलिस अब इस नेटवर्क के दुबई कनेक्शन की बारीकी से पड़ताल कर रही है। इसमें हवाला कारोबार की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।

दो साल से सक्रिय था यह नेटवर्क

यह गिरोह राजस्थान में पिछले दो साल से लगातार सक्रिय था। इन्होंने बड़ी चतुराई से व्यापारियों के सिस्टम में सेंध लगाई थी।

व्यापारियों की जानकारी में बदलाव कर उन्हें आर्थिक चपत लगाई जा रही थी। इस नेटवर्क के खिलाफ दिल्ली, जोधपुर और सीकर में छापेमारी की जा रही है।

गिरफ्तार आरोपियों में सुल्तान खान, नंद किशोर, अशोक कुमार भंडारी, प्रमोद खत्री और निर्मल सोनी शामिल हैं। इन्हें कोर्ट ने पांच दिन की रिमांड पर भेजा है।

ठगी का पूरा मॉडस ऑपरेंडी

यह गिरोह सबसे पहले व्यापारियों की विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) की आईडी हैक करता था। हैकिंग के बाद उसमें जरूरी बदलाव किए जाते थे।

इसके बाद जाली दस्तावेजों की मदद से नए डिजिटल हस्ताक्षर तैयार किए जाते थे। इन हस्ताक्षरों के जरिए बैंक खातों तक पहुंच बनाई जाती थी।

एक बार बैंक खाते का एक्सेस मिलने के बाद करोड़ों रुपये तुरंत ट्रांसफर कर लिए जाते थे। यह पूरी प्रक्रिया इतनी तेज होती थी कि व्यापारी को भनक भी नहीं लगती थी।

KYC प्रक्रिया में बड़ा फर्जीवाड़ा

जांच के दौरान केवाईसी (KYC) प्रक्रिया में भी भारी अनियमितताएं पाई गई हैं। जयपुर के एक परिवादी की केवाईसी जोधपुर से ऑनलाइन की गई थी।

हैरानी की बात यह है कि इस ट्रांजेक्शन का भुगतान दिल्ली से हुआ था। वहीं पूरी आईडी को दुबई से संचालित किया जा रहा था।

गिरोह का सरगना सुल्तान केवाईसी के बदले लोगों को दो से पांच हजार रुपये देता था। वह वीडियो कॉल के जरिए फर्जी सत्यापन करवाता था।

फर्जी दस्तावेजों में मिलीं गलतियां

आरोपियों के पास से बरामद फर्जी पैन कार्ड और अन्य दस्तावेजों में कई गलतियां मिली हैं। इनमें 'इंडिया' और 'इनकम टैक्स' जैसे शब्दों की स्पेलिंग गलत थी।

स्पेशल पुलिस कमिश्नर ओमप्रकाश के अनुसार, गिरोह के 13 सदस्यों की पहचान हो चुकी है। अन्य सदस्यों की तलाश के लिए पुलिस टीमें लगातार दबिश दे रही हैं।

पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है कि डिजिटल सिग्नेचर जारी करने वाली कंपनियों ने इतनी बड़ी लापरवाही कैसे की। क्या इन कंपनियों के अधिकारी भी गिरोह से मिले हुए थे?

चार्टर्ड अकाउंटेंट की संदिग्ध भूमिका

इस पूरे घोटाले में चार्टर्ड अकाउंटेंट की भूमिका सबसे ज्यादा संदेहास्पद है। पुलिस मान रही है कि तकनीकी जानकारी के बिना इतनी बड़ी ठगी संभव नहीं थी।

कई सीए पर आरोप है कि उन्होंने बिना सत्यापन के डिजिटल सिग्नेचर बनवाने में मदद की। पुलिस अब ऐसे सभी प्रोफेशनल्स की लिस्ट तैयार कर रही है।

आने वाले दिनों में कुछ बड़े नामों पर पुलिस का शिकंजा कस सकता है। पुलिस इस मामले में किसी को भी बख्शने के मूड में नहीं दिख रही है।

व्यापारियों के लिए पुलिस की सलाह

पुलिस ने व्यापारियों को अपनी डिजिटल आईडी और सिग्नेचर को सुरक्षित रखने की सलाह दी है। किसी भी अनजान व्यक्ति को अपनी लॉगइन डिटेल्स न दें।

समय-समय पर अपने बैंक स्टेटमेंट और ट्रांजेक्शन हिस्ट्री की जांच करते रहें। यदि कोई संदिग्ध गतिविधि दिखे, तो तुरंत साइबर सेल को सूचित करें।

डिजिटल सिग्नेचर का उपयोग केवल अधिकृत कार्यों के लिए ही करें। अपनी आईडी के पासवर्ड को समय-समय पर बदलते रहना भी सुरक्षा के लिए जरूरी है।

जांच का अगला चरण

पुलिस अब गिरफ्तार आरोपियों से कड़ाई से पूछताछ कर रही है। उनका लक्ष्य इस गिरोह के मास्टरमाइंड तक पहुंचना है जो संभवतः विदेश में बैठा है।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) को भी इस मामले की जानकारी दी जा सकती है। क्योंकि इसमें मनी लॉन्ड्रिंग और विदेशी मुद्रा के अवैध लेनदेन का मामला बनता है।

जयपुर पुलिस की यह कार्रवाई साइबर अपराध के खिलाफ एक बड़ी जीत मानी जा रही है। इससे अन्य ठगों के बीच भी कड़ा संदेश जाएगा।

डिजिटल सुरक्षा पर उठे सवाल

इस घटना ने भारत की डिजिटल सुरक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कैसे कोई इतनी आसानी से सरकारी पोर्टल हैक कर सकता है?

डिजिटल सिग्नेचर जारी करने वाली कंपनियों की जवाबदेही तय होना आवश्यक है। बिना फिजिकल वेरिफिकेशन के सिग्नेचर जारी करना एक बड़ा अपराध है।

सरकार को डिजिटल ट्रांजेक्शन के नियमों को और अधिक सख्त बनाने की जरूरत है। ताकि भविष्य में व्यापारियों की मेहनत की कमाई सुरक्षित रह सके।

निष्कर्ष और कार्रवाई

राजस्थान पुलिस की सतर्कता से 400 करोड़ का यह खेल उजागर हुआ है। हालांकि, अभी बहुत कुछ सामने आना बाकी है।

पुलिस की टीमें दिल्ली और अन्य राज्यों में छापेमारी कर रही हैं। जल्द ही इस गिरोह के अन्य सदस्यों की गिरफ्तारी भी संभव है।

जनता को भी जागरूक रहने की आवश्यकता है ताकि वे ऐसे साइबर अपराधियों का शिकार न बनें। सतर्कता ही बचाव का सबसे बड़ा साधन है।

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