राजस्थान | राजस्थान में दशहरा सिर्फ रावण दहन का पर्व नहीं है। यह सदियों से चली आ रही अनूठी परंपराओं और लोक आस्थाओं का उत्सव है।
झालरापाटन की ऐतिहासिक विरासत
झालरापाटन में दशहरे की पहचान रावण के पूरे कुनबे की स्थायी मूर्तियों से है। यहां रावण, मंदोदरी, कुंभकर्ण, विभीषण और मेघनाद की मूर्तियां करीब 186 साल से मौजूद हैं।
इन मूर्तियों को 1920 में पक्का स्वरूप दिया गया था। लोग मंदोदरी के वस्त्रों के टुकड़े को सुख-समृद्धि का प्रतीक मानकर घर ले जाते हैं।
कोटा की अनूठी खेल-संस्कृति
कोटा के किशोरपुरा और नांता में जेठी समाज के अखाड़ों में मिट्टी का रावण बनाया जाता है। दशमी की सुबह बच्चे इसे पैरों तले रौंदते हैं, जो अहंकार के अंत का प्रतीक है।
इस रस्म के बाद पारंपरिक कुश्ती का आयोजन होता है। यह परंपरा कोटा के दशहरा उत्सव को अन्य जगहों से अलग पहचान देती है।
भीलवाड़ा और सिरोही की परंपराएं
भीलवाड़ा में रामलीला के दौरान राम-रावण युद्ध का मंचन होता है। इसके बाद आधुनिक तकनीक और रिमोट कंट्रोल से पुतलों का दहन किया जाता है।
सिरोही में रावण दहन के बाद जलेबी-फाफड़ा खाने का चलन है। वहीं, मंडार और आसपास के गांवों में राजपूत परिवारों द्वारा शस्त्र पूजन की परंपरा निभाई जाती है।
अन्य शहरों में आयोजन
अनूपगढ़ में कारीगर पुतले बनाने से पहले उनकी पूजा करते हैं। वहीं, चूरू की रेलवे कॉलोनी में 1968 से शुरू हुई रावण दहन की परंपरा आज एक बड़े सामूहिक उत्सव का रूप ले चुकी है।
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