Blog

स्कूल सुरक्षा पर सवाल: स्कूलों की हालत सुधारें, फिर सुरक्षा की बात करें: राठौड़

Pradeep Beedawat · 31 अगस्त 2026, 02:39 दोपहर
कांग्रेस विधि प्रकोष्ठ के जिलाध्यक्ष प्रेम सिंह राठौड़ ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन सरकार को पहले स्कूलों की जर्जर हालत और बुनियादी सुविधाओं की कमी को दूर करना चाहिए।

Pali | कांग्रेस विधि प्रकोष्ठ के जिलाध्यक्ष प्रेम सिंह राठौड़ जाडन ने राजकीय विद्यालयों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर शिक्षा विभाग द्वारा जारी निर्देशों पर अपनी बात रखी है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि वे बच्चों की सुरक्षा के विरोधी नहीं हैं, क्योंकि यह सर्वोच्च प्राथमिकता है।

निर्देशों का समर्थन, पर सवाल भी

राठौड़ ने कहा कि विद्यालय परिसर में अनधिकृत प्रवेश, बिना अनुमति फोटो-वीडियोग्राफी और किसी भी आपत्तिजनक गतिविधि पर प्रभावी रोक लगनी ही चाहिए।

हालांकि, उन्होंने सरकार के इस आदेश पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सवाल उठाया कि क्या केवल आगंतुक पंजिका और बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश पर रोक लगाने से राजस्थान के सरकारी विद्यालय सुरक्षित हो जाएंगे?

Pic : Prem Singh Rathore Jadan

स्कूलों की जमीनी हकीकत

राठौड़ ने सरकार से विद्यालयों की जमीनी स्थिति पर जवाब देने की मांग की।

उन्होंने कहा कि आज भी प्रदेश के अनेक राजकीय विद्यालयों में भवनों की मरम्मत, कक्षा-कक्षों की स्थिति, चारदीवारी, शौचालय, पेयजल, बिजली, और इंटरनेट जैसी सुविधाओं का अभाव है।

बुनियादी सुविधाओं का संकट

उन्होंने बताया कि कंप्यूटर, खेल मैदान और दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए आवश्यक सुविधाओं को लेकर भी गंभीर अंतर दिखाई देता है।

राठौड़ ने इस बात पर जोर दिया कि स्वयं राज्य सरकार को जून 2026 में विद्यालय भवनों की सुरक्षा, मरम्मत और निर्माण कार्यों की गहन जांच के निर्देश देने पड़े हैं, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है।

आंकड़े बयां करते हैं सच्चाई

यू-डाइस प्लस 2024-25 के राजस्थान से संबंधित आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि प्रदेश के 1,06,302 विद्यालयों में से केवल 56,702 में कंप्यूटर और 74,358 में इंटरनेट की सुविधा है।

दिव्यांग छात्रों की अनदेखी

उन्होंने आगे बताया कि विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए अनुकूल शौचालय केवल 37,579 विद्यालयों में तथा रैम्प एवं हैंडरेल की सुविधा 72,682 विद्यालयों में ही उपलब्ध है।

राठौड़ ने कहा कि इन आंकड़ों के बाद बाकी विद्यालयों के हालात को समझने के लिए और कुछ कहने की जरूरत नहीं है।

जब किसी विद्यालय की चारदीवारी कमजोर हो, भवन की मरम्मत लंबित हो, पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध नहीं हों, प्रयोगशाला और पुस्तकालय की स्थिति ठीक नहीं हो, डिजिटल सुविधाएं प्रत्येक विद्यालय तक नहीं पहुंची हों तथा दिव्यांग बच्चों के लिए आवश्यक सुविधाएं अधूरी हों, तब सरकार की पहली प्राथमिकता क्या होनी चाहिए—आगंतुक पंजिका या विद्यालय की बुनियादी सुरक्षा?

अभिभावकों पर संदेह क्यों?

उन्होंने कहा कि विद्यालय में आने वाले प्रत्येक अभिभावक को संभावित अपराधी की तरह देखना उचित नहीं है।

अभिभावक अपने बच्चे की पढ़ाई, स्वास्थ्य, सुरक्षा, छात्रवृत्ति, प्रवेश, परीक्षा, प्रमाण-पत्र या किसी शिकायत के संबंध में ही विद्यालय आते हैं।

राठौड़ ने सुझाव दिया कि उन्हें सम्मानजनक और पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से प्रवेश देने की व्यवस्था होनी चाहिए, न कि सुरक्षा के नाम पर उनके और विद्यालय के बीच दीवार खड़ी की जाए।

पॉक्सो पर गलत प्रचार

राठौड़ ने सोशल मीडिया पर चल रहे इस प्रचार को कानून की गलत व्याख्या बताया कि ‘सरकारी स्कूल में पैर रखते ही पॉक्सो लग जाएगा’।

मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि सोशल मीडिया पर इस आदेश को लेकर किया जा रहा यह प्रचार कि ‘सरकारी स्कूल में पैर रखते ही पॉक्सो लग जाएगा’, कानून की गलत व्याख्या है। विद्यालय परिसर में प्रवेश करना अपने आप में पॉक्सो के तहत अपराध नहीं है। पॉक्सो अधिनियम तभी लागू होगा, जब अधिनियम के अंतर्गत परिभाषित अपराध के आवश्यक तत्व मौजूद हों।

उन्होंने कहा कि सरकार को पॉक्सो जैसे गंभीर कानून का नाम लेकर भय का वातावरण बनाने के बजाय शिक्षकों, अभिभावकों और विद्यार्थियों को कानून की सही जानकारी देनी चाहिए।

सरकार से पूछे सात सवाल

कांग्रेस विधि प्रकोष्ठ के जिलाध्यक्ष प्रेम सिंह राठौड़ ने सरकार से कुछ महत्वपूर्ण सवाल पूछे हैं ताकि व्यवस्था में सुधार हो सके।

सुरक्षित स्कूल, बंद नहीं

राठौड़ ने मांग की कि प्रत्येक राजकीय विद्यालय का सुरक्षा अंकेक्षण कराया जाए और भवन, चारदीवारी, शिक्षकों की उपलब्धता, शौचालय, पेयजल, बिजली, इंटरनेट जैसी मूलभूत सुविधाएं सुनिश्चित की जाएं।

बच्चों को सुरक्षित विद्यालय चाहिए, बंद विद्यालय नहीं। अभिभावकों को सम्मान चाहिए, संदेह की नजर नहीं। पॉक्सो का प्रभावी इस्तेमाल होना चाहिए, लेकिन उसके नाम पर अनावश्यक भय नहीं फैलाया जाना चाहिए।

अंत में उन्होंने कहा कि वे बाल सुरक्षा के पक्ष में हैं, लेकिन इसके नाम पर सरकारी विद्यालयों की मूलभूत कमियों और सरकार की प्रशासनिक जिम्मेदारियों को छिपाने के प्रयास की वे निंदा करते हैं।

*Edit with Google AI Studio

← पूरा आर्टिकल पढ़ें (Full Version)