राजस्थान

एटीएम चोरों को मिली अनोखी सजा: राजस्थान हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: एटीएम चोरी के आरोपियों को मिली जमानत, 30 दिन तक रोज लगाने होंगे 5 पौधे

मानवेन्द्र जैतावत · 29 मार्च 2026, 10:15 दोपहर
जोधपुर हाईकोर्ट ने एटीएम चोरी के आरोपियों को जमानत देते हुए पर्यावरण संरक्षण और सुधार का अनूठा रास्ता अपनाया है। कोर्ट ने आरोपियों को एक महीने तक प्रतिदिन पांच पौधे लगाने का आदेश दिया है।

जोधपुर | राजस्थान हाईकोर्ट ने हाल ही में एक ऐसा फैसला सुनाया है जो न्यायपालिका के मानवीय और सुधारात्मक चेहरे को उजागर करता है। कोर्ट ने एटीएम मशीन काटकर चोरी करने के मामले में गिरफ्तार दो आरोपियों को जमानत दे दी है। हालांकि, यह जमानत सामान्य शर्तों के साथ नहीं, बल्कि एक विशेष सामाजिक जिम्मेदारी के साथ दी गई है। न्यायमूर्ति चंद्र प्रकाश श्रीमाली की एकल पीठ ने आरोपियों को अगले 30 दिनों तक प्रतिदिन पांच पौधे लगाने का निर्देश दिया है। यह आदेश न केवल आरोपियों के सुधार की दिशा में एक कदम है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति भी एक सकारात्मक संदेश देता है।

मामले की पृष्ठभूमि और घटना का विवरण

जोधपुर जिले में एटीएम काटकर चोरी करने की यह घटना काफी चर्चा में रही थी। पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने गैस कटर का उपयोग करके एसबीआई के एटीएम को निशाना बनाया था। वारदात को अंजाम देने के लिए उन्होंने एक चोरी के वाहन का उपयोग किया और उस पर फर्जी नंबर प्लेट भी लगाई थी। पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए वारिस उर्फ लहाकी और उस्मान उर्फ अंधा को गिरफ्तार किया था। इनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। पुलिस ने मामले की जांच पूरी कर अदालत में चालान भी पेश कर दिया था।

कोर्ट में अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलें

सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने जमानत का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि आरोपियों का आपराधिक इतिहास रहा है। वारिस के खिलाफ पूर्व में तीन और उस्मान के खिलाफ दो आपराधिक मामले दर्ज हैं। अभियोजन ने कहा कि ऐसे पेशेवर अपराधियों को जमानत देने से समाज में गलत संदेश जाएगा और अपराध की पुनरावृत्ति की संभावना बनी रहेगी। वहीं, बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी कि पुलिस ने जांच पूरी कर ली है और अब आरोपियों से किसी भी प्रकार की बरामदगी शेष नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि केवल पुराने मामलों के आधार पर किसी को लंबे समय तक जेल में नहीं रखा जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का संदर्भ

न्यायमूर्ति चंद्र प्रकाश श्रीमाली ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत एक नियम है और जेल एक अपवाद। पीठ ने कहा कि यदि आरोपी जांच में सहयोग कर रहे हैं और उनसे कुछ भी बरामद करना शेष नहीं है, तो उन्हें जेल में रखने का कोई औचित्य नहीं बनता। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि किसी व्यक्ति के आपराधिक इतिहास को जमानत खारिज करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता, बशर्ते अन्य परिस्थितियां जमानत के पक्ष में हों।

सुधारात्मक न्याय प्रणाली पर विशेष जोर

हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत आदेश में सुधारात्मक न्याय प्रणाली (Reformative Justice) के महत्व पर प्रकाश डाला। अदालत ने टिप्पणी की कि छोटे या पहली बार अपराध करने वालों को लंबे समय तक जेल में रखने से वे अक्सर और भी खतरनाक अपराधी बनकर बाहर निकलते हैं। जेलों का वातावरण कई बार अपराधियों को सुधारने के बजाय उन्हें समाज के प्रति और अधिक हिंसक बना देता है। इसलिए, कोर्ट ने माना कि अपराधियों को समाज की मुख्यधारा में वापस लाने के लिए सुधारात्मक उपायों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

पौधरोपण की कड़ी शर्तें और निगरानी

जमानत की शर्तों के तहत, वारिस और उस्मान को आदेश की तारीख से एक सप्ताह के भीतर पौधरोपण शुरू करना होगा। उन्हें 30 दिनों तक रोजाना कम से कम पांच पौधे लगाने होंगे। ये पौधे सार्वजनिक स्थानों या वन विभाग द्वारा निर्धारित क्षेत्रों में लगाए जाएंगे। वन अधिकारी इन पौधों को निःशुल्क उपलब्ध कराएंगे। केवल पौधा लगाना ही काफी नहीं होगा, बल्कि उनकी देखभाल की जिम्मेदारी भी आरोपियों की होगी। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि आरोपियों को हर दिन की फोटो और वीडियो संबंधित पुलिस थाने में जमा करानी होगी ताकि अनुपालन सुनिश्चित हो सके।

राज्य सरकार और मुख्य सचिव को निर्देश

हाईकोर्ट ने इस मामले को केवल एक व्यक्तिगत जमानत तक सीमित नहीं रखा। पीठ ने राजस्थान के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे अपराधियों के पुनर्वास के लिए एक व्यापक कार्ययोजना तैयार करें। कोर्ट चाहता है कि राज्य सरकार ऐसे तंत्र विकसित करे जिससे अपराधियों के आपराधिक व्यवहार के मूल कारणों की पहचान की जा सके। इसमें उनकी आर्थिक स्थिति, शिक्षा का अभाव और सामाजिक परिवेश का अध्ययन शामिल होना चाहिए। सरकार को कौशल विकास और काउंसलिंग जैसे कार्यक्रम शुरू करने के लिए भी कहा गया है।

प्रशासन और पुलिस की बढ़ी जिम्मेदारी

अदालत ने पुलिस अधिकारियों को भी निर्देश दिया है कि वे आरोपियों की पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि का पूरा विवरण कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करें। इससे भविष्य में सुधारात्मक उपायों को और अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने में मदद मिलेगी। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को भी इस प्रक्रिया में शामिल होने के निर्देश दिए गए हैं। प्राधिकरण को ऐसे आरोपियों के लिए समाज में पुनर्स्थापन की योजना बनाने को कहा गया है ताकि वे जेल से बाहर आने के बाद फिर से अपराध की दुनिया में कदम न रखें।

निष्कर्ष और सामाजिक प्रभाव

राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला न्यायशास्त्र में एक नई मिसाल पेश करता है। 'ग्रीन जस्टिस' या 'पर्यावरण न्याय' का यह मॉडल न केवल अपराधियों को उनकी गलती का एहसास कराता है, बल्कि उन्हें समाज के लिए कुछ उपयोगी करने का अवसर भी देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के आदेशों से न्यायपालिका के प्रति जनता का विश्वास बढ़ता है और अपराधियों के मन में भी सुधार की भावना जागृत होती है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य सरकार इस दिशा में कितनी जल्दी एक ठोस नीति तैयार करती है।

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