जोधपुर | राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने न्यायपालिका के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाया है। यह फैसला उन सैकड़ों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण लेकर आया है जो पिछले कई वर्षों से कानूनी दांव-पेंच में फंसे हुए थे।
न्याय के लिए एक अनोखा और व्यावहारिक समाधान
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने अदालती कार्यवाही में हो रही देरी को गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने माना कि पारिवारिक विवादों में समय पर न्याय मिलना सबसे आवश्यक है। इसीलिए कोर्ट ने 75 लंबित अपीलों का तुरंत निस्तारण करने का एक अनूठा रास्ता निकाला।
'न्याय में देरी, न्याय न मिलने के समान है'
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से 'जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड' के कानूनी सिद्धांत का उल्लेख किया है। बेंच ने कहा कि पक्षकारों को केवल तकनीकी कारणों से सालों तक इंतजार नहीं कराया जा सकता। विशेषकर उन मामलों में जहां भरण-पोषण और परिवार का अस्तित्व दांव पर लगा हो।
क्या है पूरा मामला और कानूनी उलझन?
इस पूरे विवाद की जड़ हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 24 के तहत आने वाले आदेशों में छिपी है। धारा 24 मुख्य रूप से मुकदमे के दौरान पत्नी या पति को मिलने वाले अंतरिम भरण-पोषण और कानूनी खर्च से संबंधित है। पिछले 14 सालों से इस बात पर कानूनी विवाद चल रहा था कि इन आदेशों के खिलाफ अपील हो सकती है या नहीं।
2010 से 2022 तक के विरोधाभासी फैसले
साल 2010 में 'अजय मलिक बनाम शशि' मामले में हाईकोर्ट ने कहा था कि ये आदेश अंतरवर्ती हैं और इनके खिलाफ अपील नहीं हो सकती। हालांकि, साल 2018 में 'कविता व्यास बनाम दीपक दवे' मामले में पूर्ण पीठ ने इस नज़ीर को पलट दिया था। पूर्ण पीठ ने माना था कि इन आदेशों के खिलाफ अपील की जा सकती है और इसे पोषणीय माना।
लार्जर बेंच के गठन में 4 साल का लंबा इंतजार
2018 के फैसले के बाद बड़ी संख्या में अपीलें दायर की गईं, लेकिन 2022 में एक अन्य खंडपीठ ने इस पर फिर से सवाल उठा दिए। 27 मई 2022 को कोर्ट ने पाया कि 2018 का फैसला सुप्रीम कोर्ट की कुछ पुरानी नज़ीरों के विपरीत हो सकता है। इसी कारण मामले को एक बार फिर वृहद पीठ यानी लार्जर बेंच को रेफर कर दिया गया था।
पक्षकारों की पीड़ा और कोर्ट की संवेदनशीलता
मई 2022 से लेकर अब तक लगभग 4 साल बीत चुके हैं, लेकिन लार्जर बेंच का गठन नहीं हो पाया है। इस देरी के कारण कौशल्या सोनी जैसे 75 अन्य अपीलार्थियों के मामले ठंडे बस्ते में पड़े हुए थे। जस्टिस मोंगा ने महसूस किया कि लार्जर बेंच के इंतजार में इन गरीब और जरूरतमंद पक्षकारों को और अधिक परेशान नहीं किया जा सकता।
न्यायिक अनुशासन और 'आउट ऑफ द बॉक्स' सोच
जस्टिस अरुण मोंगा ने टिप्पणी की कि एक समकक्ष खंडपीठ लार्जर बेंच को रेफर किए गए मामले पर खुद फैसला नहीं दे सकती। यह न्यायिक अनुशासन के खिलाफ होगा। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि कोर्ट मूकदर्शक बनकर नहीं बैठ सकता। इसलिए उन्होंने इन सभी अपीलों को एकल पीठ की रिट याचिकाओं में बदलने का आदेश दे दिया।
अनुच्छेद 226 का प्रभावी इस्तेमाल
कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी व्यापक शक्तियों का इस्तेमाल किया है। अब ये 75 मामले खंडपीठ के बजाय एकल पीठ के सामने रिट याचिकाओं के रूप में सुने जाएंगे। इससे न केवल कानूनी अड़चन दूर होगी, बल्कि मामलों का निपटारा भी बहुत तेजी से हो सकेगा।
रजिस्ट्री को सख्त निर्देश जारी
हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि वह इन सभी 75 मामलों को तुरंत नए सिरे से दर्ज करे। इन्हें एकल पीठ की रिट याचिकाओं के रूप में सूचीबद्ध किया जाएगा। इसके साथ ही रजिस्ट्रार (न्यायिक) को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश को सूचित करने को कहा गया है ताकि लार्जर बेंच का गठन भी जल्द हो सके।
आम आदमी पर इस फैसले का असर
यह फैसला उन महिलाओं के लिए बड़ी राहत है जो भरण-पोषण के लिए सालों से कोर्ट के चक्कर लगा रही हैं। अब उन्हें लार्जर बेंच के फैसले का इंतजार नहीं करना होगा। उनकी याचिकाओं पर एकल पीठ तुरंत सुनवाई कर सकेगी और उन्हें न्याय मिल सकेगा।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि राजस्थान हाईकोर्ट का यह कदम पूरे देश की अदालतों के लिए एक उदाहरण है। अक्सर देखा जाता है कि बड़े कानूनी सवालों के बीच छोटे पक्षकारों के हित दब जाते हैं। इस फैसले ने साबित कर दिया है कि न्याय की आत्मा प्रक्रियात्मक नियमों से ऊपर होती है।
भविष्य की कानूनी दिशा
इस आदेश के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि जब तक लार्जर बेंच कोई अंतिम फैसला नहीं लेती, तब तक इन मामलों को रिट के जरिए सुना जा सकता है। इससे अदालतों पर लंबित मुकदमों का बोझ भी कम होगा। साथ ही पक्षकारों को त्वरित न्याय मिलने का रास्ता भी साफ होगा।
निष्कर्ष: न्याय की जीत
जोधपुर मुख्यपीठ का यह निर्णय वास्तव में जनहितैषी है। जस्टिस मोंगा और जस्टिस बेनीवाल ने यह दिखा दिया है कि यदि इच्छाशक्ति हो तो कानून की जटिलताओं के बीच भी समाधान निकाला जा सकता है। यह 75 परिवारों के लिए एक नई शुरुआत है जो अब जल्द ही अपने हक का फैसला सुन सकेंगे।