जोधपुर | राजस्थान उच्च न्यायालय की डबल बेंच ने माउंट आबू के इको-सेंसिटिव जोन (ESZ) की सुरक्षा को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और वरिष्ठ न्यायाधीश बलजिंदर सिंह सन्धु की पीठ ने जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए पर्यावरण को सर्वोपरि रखा है।
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि विकास के नाम पर पर्यावरण संरक्षण की बलि नहीं दी जा सकती है। यह निर्णय नितिन जैन, मनोज चौरसिया और जयंतीलाल उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका पर आया है।
याचिकाकर्ताओं ने माउंट आबू में हो रहे अनियमित विकास, अवैध निर्माण और पर्यावरणीय क्षरण की ओर कोर्ट का ध्यान आकर्षित किया था। कोर्ट ने माना कि माउंट आबू राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन है और इसकी पारिस्थितिकी अद्वितीय है।
जोनल मास्टर प्लान 2030 की अनिवार्यता
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि ESZ अधिसूचना के तहत जोनल मास्टर प्लान 2030 ही एकमात्र वैधानिक योजना है। भविष्य में होने वाला कोई भी विकास कार्य इसी योजना के अनुरूप होना चाहिए।
अदालत ने चेतावनी दी कि किसी भी परिस्थिति में मास्टर प्लान के विपरीत निर्माण या भूमि परिवर्तन की अनुमति नहीं दी जाएगी। यदि कोई उल्लंघन पाया जाता है, तो प्रशासन को तुरंत सख्त कदम उठाने होंगे।
उल्लंघन की स्थिति में सीलिंग, ध्वस्तीकरण और अभियोजन की कार्रवाई अनिवार्य रूप से की जाएगी। प्रशासन अब केवल नोटिस जारी करके अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता है।
अवैध निर्माण और प्रशासन की जवाबदेही
हाईकोर्ट ने सरकार की सतर्कता समिति को फटकार लगाते हुए कहा कि उसे केवल कागजों पर सीमित नहीं रहना चाहिए। समिति को अवैध निर्माण और वन भूमि पर अतिक्रमण की नियमित निगरानी करनी होगी।
पहाड़ी काटने और कचरा डंपिंग जैसी गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए समिति को प्रभावी ढंग से काम करना होगा। कोर्ट ने स्थानीय प्रशासन को शिकायतों का पारदर्शी रिकॉर्ड रखने के निर्देश दिए हैं।
“विकास के नाम पर पर्यावरण संरक्षण की बलि नहीं दी जा सकती।”
अदालत ने कहा कि प्रभावी प्रवर्तन के बिना केवल कागजी कार्रवाई कानून के जनादेश को पूरा नहीं करती है। दंडात्मक कदम उठाना अब प्रशासन के लिए वैकल्पिक नहीं बल्कि अनिवार्य है।
संवैधानिक दायित्व और पर्यावरण अधिकार
संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि स्वच्छ पर्यावरण में रहना प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है। यह राज्य का संवैधानिक कर्तव्य है कि वह प्रकृति की रक्षा करे।
अनुच्छेद 48A के तहत राज्य का और 51A(g) के तहत प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वे पर्यावरण को सुरक्षित रखें। कोर्ट ने प्लास्टिक और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों को कड़ाई से लागू करने को कहा है।
माउंट आबू के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के 2022 के आदेशों का भी संदर्भ दिया गया। मृदा अपरदन और जल प्रदूषण जैसी समस्याओं को रोकने के लिए तत्काल कार्रवाई की जरूरत है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और भविष्य की राह
माउंट आबू को पहली बार 2009 में इको-सेंसिटिव जोन घोषित किया गया था, जिसके बाद 2020 में नई अधिसूचना जारी हुई। यह क्षेत्र दुर्लभ वनस्पतियों, नक्की झील और दिलवाड़ा मंदिरों जैसी विरासत को समेटे हुए है।
अदालत का मानना है कि पर्यावरणीय शासन केवल निजी मुकदमों पर निर्भर नहीं रह सकता है। इसके लिए निरंतर संस्थागत सतर्कता और सरकारी विभागों के बीच उचित समन्वय की आवश्यकता है।
यह फैसला वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए माउंट आबू को एक अद्वितीय विरासत के रूप में संरक्षित करेगा। कोर्ट ने इसी के साथ सभी लंबित आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया है।
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