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नाता प्रथा असंवैधानिक: हाईकोर्ट: राजस्थान हाईकोर्ट: नाता प्रथा असंवैधानिक, न्याय सर्वोपरि

thinQ360 · 20 मई 2026, 09:03 रात
हाईकोर्ट ने नाता प्रथा को अवैध बताते हुए कहा कि रीति-रिवाजों को न्याय के आगे झुकना होगा।

जोधपुर | राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने एक ऐतिहासिक फैसले में 'नाता प्रथा' को असंवैधानिक और महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ बताया है। जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि रीति-रिवाजों को हमेशा न्याय के सिद्धांतों के सामने झुकना होगा। अकट ने राजसमंद की फैमिली कोर्ट के उस निर्णय को बरकरार रखा है, जिसमें एक पति की तलाक की अर्जी खारिज कर दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत पहली पत्नी के रहते बिना तलाक दूसरी शादी शून्य है।

नाता प्रथा और कानूनी मान्यता

हाईकोर्ट ने अपने 'रिपोर्टेबल' फैसले में स्पष्ट किया कि समाज की ऐसी प्रथाओं को स्वीकार्य सीमाओं से बाहर कर देना चाहिए। कोर्ट के अनुसार, नाता प्रथा न केवल कानून के खिलाफ है, बल्कि यह महिलाओं के सम्मान को भी ठेस पहुँचाती है। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5(i) और 11 के तहत दूसरी शादी को कोई कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं है। कोर्ट ने कहा कि अधिनियम की धारा 29(2) केवल प्रथागत तलाक की बात करती है, न कि बिना तलाक दूसरी शादी की।

क्या था राजसमंद का यह विवाद?

यह मामला राजसमंद जिले के आमेट का है, जहाँ एक सरकारी शिक्षक ने 1992 में शादी की थी। 1997 में पोस्टिंग अलग होने के बाद पति ने बिना तलाक लिए दूसरी महिला के साथ 'नाता' कर लिया। पति ने न केवल दूसरी महिला के साथ बच्चे किए, बल्कि सरकारी दस्तावेजों में भी उसका नाम दर्ज करा दिया। इसके बाद उसने फैमिली कोर्ट में पहली पत्नी से तलाक के लिए अर्जी दाखिल की थी।

क्रूरता और परित्याग पर कोर्ट का रुख

पति का दावा था कि उसकी पहली पत्नी ने उसे बिना कारण छोड़ दिया, जो मानसिक क्रूरता है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि न्याय मांगने वाले के हाथ साफ होने चाहिए। अदालत ने टिप्पणी की कि जब पति खुद दूसरी महिला के साथ रह रहा हो, तो पत्नी का अलग रहना जायज है। इसे पत्नी द्वारा किया गया 'परित्याग' या 'क्रूरता' नहीं माना जा सकता है।

कंस्ट्रक्टिव डेजर्शन का सिद्धांत

कोर्ट ने 'कंस्ट्रक्टिव डेजर्शन' यानी रचनात्मक परित्याग के सिद्धांत को समझाया। इसके अनुसार, यदि पति की गलत हरकतों के कारण पत्नी घर छोड़ती है, तो इसके लिए पति ही जिम्मेदार माना जाएगा। महज सरकारी नौकरी के कारण अलग-अलग शहरों में रहने को कानूनन परित्याग की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने पत्नी द्वारा दर्ज दहेज प्रताड़ना के मुकदमे को भी जायज प्रतिक्रिया माना।

समाज और न्याय का संतुलन

फैसले के अंत में अदालत ने नाता प्रथा को संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 39 के विरुद्ध बताया। ये अनुच्छेद महिलाओं को समानता और सम्मान के साथ जीने का अधिकार प्रदान करते हैं।परंपरा को अंतरात्मा के साथ चलना चाहिए, और रीति-रिवाजों को न्याय के आगे झुकना होगा।कोर्ट ने चिंता जताई कि बिना कानूनी दर्जे के रहने वाली 'नाता पत्नी' को भी कोई अधिकार नहीं मिलते। ऐसी प्रथाएं समाज में महिलाओं की स्थिति को कमजोर करती हैं और उन्हें कानूनी सुरक्षा से वंचित रखती हैं। अदालत का यह फैसला समाज में व्याप्त कुरीतियों पर कड़ा प्रहार है। यह स्पष्ट करता है कि व्यक्तिगत कानून और रीति-रिवाज कभी भी संवैधानिक अधिकारों और लैंगिक न्याय से ऊपर नहीं हो सकते।

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