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राजस्थान में मातृ मृत्यु दर के आंकड़े: राजस्थान: कोटा में सबसे सुरक्षित प्रसव, बाड़मेर में स्थिति चिंताजनक

desk · 20 मई 2026, 01:20 दोपहर
राजस्थान में मातृ मृत्यु दर में भारी गिरावट, कोटा टॉप पर जबकि बाड़मेर सबसे पीछे।

जयपुर | राजस्थान में पिछले पांच वर्षों में मातृ मृत्यु दर (MMR) में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। स्वास्थ्य विभाग के ताजा आंकड़ों के अनुसार, राज्य में प्रति एक लाख जीवित जन्मों पर होने वाली माताओं की मृत्यु का ग्राफ तेजी से गिरा है। यह राज्य के स्वास्थ्य ढांचे में हो रहे सुधारों का एक बड़ा संकेत है।

मातृ मृत्यु दर में गिरावट का सफर

वर्ष 2020-21 में राजस्थान का एमएमआर 113 था, जो अब 2025-26 में घटकर 86 पर आ गया है। यह गिरावट राज्य सरकार की स्वास्थ्य योजनाओं और बेहतर निगरानी का परिणाम मानी जा रही है। पिछले पांच वर्षों में यह आंकड़ा लगातार कम हुआ है।

आंकड़ों के अनुसार, 2021-22 में यह दर 105 थी, जो 2023-24 तक 97 पर पहुंच गई थी। वर्तमान वित्तीय वर्ष में इसमें और भी सुधार देखने को मिला है, जिससे राजस्थान अब राष्ट्रीय लक्ष्यों की ओर तेजी से बढ़ रहा है।

कोटा और जयपुर में सबसे सुरक्षित प्रसव

हाड़ौती क्षेत्र का कोटा जिला मातृ सुरक्षा के मामले में पूरे प्रदेश में अव्वल रहा है। यहां मृत्यु दर महज 58-62 के बीच दर्ज की गई है। कोटा ने स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में राष्ट्रीय मानकों को लगभग हासिल कर लिया है।

राजधानी जयपुर 62-65 के स्कोर के साथ दूसरे स्थान पर है। यहां की अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं और विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता प्रसूताओं के लिए जीवनदान साबित हो रही है। शहरों में बेहतर निगरानी तंत्र ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई है।

बेहतर प्रदर्शन करने वाले अन्य जिले

अजमेर, सीकर और झुंझुनूं जैसे जिलों में भी सकारात्मक परिणाम मिले हैं। इन क्षेत्रों में संस्थागत प्रसव का प्रतिशत बढ़ने से मृत्यु दर कम हुई है। महिलाओं में बढ़ती जागरूकता और नियमित प्रसव पूर्व जांच (ANC) इसके मुख्य कारण हैं।

हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर में भी स्वास्थ्य विभाग की गांव स्तर तक निगरानी और रेफरल सिस्टम काफी मजबूत हुआ है। जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं की समय रहते पहचान कर उन्हें उच्च केंद्रों पर भेजा जा रहा है।

बाड़मेर और जैसलमेर में चुनौतियां बरकरार

दूसरी ओर, सीमावर्ती जिलों में आज भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। बाड़मेर जिला पूरे राज्य में सबसे संवेदनशील है, जहां मृत्यु दर 162-168 के बीच है। यह राज्य के औसत से लगभग 95 प्रतिशत अधिक है।

जैसलमेर में भी यह आंकड़ा 155-160 के बीच बना हुआ है। इन रेतीले इलाकों में बिखरी हुई आबादी और समय पर क्रिटिकल केयर न मिल पाना मृत्यु दर बढ़ने की सबसे बड़ी वजह है। यहां बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की सख्त जरूरत है।

आदिवासी क्षेत्रों की गंभीर स्थिति

करौली, जालौर, धौलपुर और उदयपुर जैसे जिलों में भी मातृ मृत्यु दर अधिक है। करौली में उच्च एनीमिया दर और जालौर में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। आदिवासी क्षेत्रों में सड़क मार्ग की कमी भी अस्पताल पहुंचने में बाधा डालती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि राजस्थान ने प्रगति तो की है, लेकिन ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में एंबुलेंस सेवाओं और विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति अभी भी एक बड़ी चुनौती है। यदि इन पर ध्यान दिया जाए तो स्थिति और बेहतर होगी।

राजस्थान ने मातृ मृत्यु दर कम करने की दिशा में सराहनीय कदम उठाए हैं। यदि दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य ढांचे और पोषण अभियान को और मजबूत किया जाए, तो राज्य जल्द ही राष्ट्रीय मानकों को प्राप्त कर सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित कर सकेगा।

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