जयपुर | राजस्थान विशेष अभियान समूह (SOG) ने नीट पेपर लीक मामले में एक अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की है। टीम ने पारंपरिक जांच के बजाय 'रिवर्स इंजीनियरिंग' की रणनीति अपनाई। इससे गिरोह के मुख्य सरगना तक पहुंचना संभव हो सका।
एसओजी की अनूठी रणनीति और सफलता
एसओजी ने उन सैकड़ों परीक्षार्थियों के पीछे भागने के बजाय यह तय किया कि पेपर ऊपर से किसने भेजा। टीम ने सोशल मीडिया और कॉल रिकॉर्ड्स का गहन विश्लेषण किया।
जांच की दिशा नीचे से ऊपर की ओर रखी गई। अधिकारियों ने निर्देश दिए कि हर संदिग्ध से पूछा जाए कि उसे पेपर किसने भेजा। यही फैसला पूरी पड़ताल का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
मुख्य गिरफ्तारियां और नेटवर्क का खुलासा
8 मई को पहली सूचना मिलने के बाद एडीजी विशाल बंसल और आईजी अजयपाल लांबा सक्रिय हुए। 9 मई को टीम ने जमवारामगढ़ निवासी दिनेश बिंवाल और मांगीलाल बिंवाल को हिरासत में लिया।
दिनेश अपने बेटे ऋषि, भाई मांगीलाल और भतीजे विकास के साथ पूरा नेटवर्क चला रहा था। इसके बाद जांच की कड़ियां राजस्थान से बाहर अन्य राज्यों तक फैलती चली गईं।
सीबीआई की एंट्री और महाराष्ट्र कनेक्शन
मामले की गंभीरता को देखते हुए सीबीआई ने जांच अपने हाथ में ली। 13 मई को पुणे से मनीषा वाघमारे को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद जांच सीधे पेपर तैयार करने वाली कड़ी तक पहुंच गई।
15 मई को केमिस्ट्री लेक्चरर प्रो. पीवी कुलकर्णी की गिरफ्तारी हुई। उन पर प्रश्नपत्र लीक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का आरोप है। इससे जांच समिति के स्तर तक पहुंच गई।
एसओजी ने स्पष्ट कर दिया था कि जांच सोशल मीडिया पर पेपर पाने वालों की निचली कड़ी में नहीं उलझेगी।
गुरुग्राम से नासिक तक फैला जाल
लीक पेपर गुरुग्राम के यश यादव के पास पहुंचा था। यश ने स्वीकार किया कि उसने यह पेपर नासिक के शुभम खैरनार से प्राप्त किया था।
डिजिटल ट्रांजेक्शन और कॉल रिकॉर्ड के आधार पर अंतरराज्यीय कड़ियों को जोड़ा गया। जांच में सामने आया कि यह प्रश्नपत्र सैकड़ों परीक्षार्थियों तक सोशल मीडिया के जरिए फैल चुका था।
तकनीकी विश्लेषण के जरिए करीब 20 लोगों की 'ऊपरी कड़ी' को जोड़ा गया है। इस कार्रवाई ने परीक्षा प्रणाली की सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह पूरी जांच प्रक्रिया भविष्य में पेपर लीक जैसे मामलों को सुलझाने के लिए एक मिसाल बनेगी। एसओजी की इस कार्रवाई से बड़े नेटवर्क का अंत हुआ है।
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