नई दिल्ली | राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू सोमवार को नई दिल्ली में आयोजित एक भव्य समारोह में राजस्थान की तीन प्रमुख हस्तियों को पद्मश्री से सम्मानित करेंगी। गफरुद्दीन मेवाती जोगी, तगाराम भील और स्वामी ब्रह्मदेव को उनके अतुलनीय योगदान के लिए यह प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान दिया जाएगा।
मेवात की लोक विरासत के रक्षक गफरुद्दीन मेवाती
डीग जिले के कैथवाड़ा गांव में जन्मे गफरुद्दीन मेवाती जोगी मेवात-ब्रज क्षेत्र की लोक गायन और कथावाचन परंपरा के प्रमुख कलाकार हैं। उन्होंने अपनी कला के माध्यम से राजस्थान की संस्कृति को जीवंत रखा है।
भपंग वादन के लिए उनकी एक विशेष पहचान है। उन्होंने महाभारत, लोक रामायण, शिव विवाह और कृष्ण लीला जैसी मौखिक लोक परंपराओं को संरक्षित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।
गफरुद्दीन मेवाती ने करीब 20 लुप्त होती लोक वाद्य परंपराओं को संरक्षित करने में अपना जीवन लगा दिया। उनकी कला साधना ने मेवात की सांस्कृतिक विरासत को एक नई ऊंचाई प्रदान की है।
उन्हें पूर्व में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय सम्मान मिल चुके हैं। अब पद्मश्री उनके कला के प्रति समर्पण का सबसे बड़ा प्रमाण बनेगा।
थार के अलगोजा की वैश्विक गूंज: तगाराम भील
जैसलमेर जिले के मूलसागर गांव में जन्मे तगाराम भील ने बचपन से ही अलगोजा वादन को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया था। उन्होंने यह प्राचीन कला अपने पिता से सीखी थी।
अलगोजा थार क्षेत्र का एक पारंपरिक वाद्य यंत्र है जो दोहरी बांसुरी जैसा होता है। तगाराम ने पशु चराते समय इसका अभ्यास किया और आज वे इसके विश्वप्रसिद्ध कलाकार हैं।
वर्ष 1981 में स्वतंत्रता दिवस समारोह में उनकी प्रस्तुति ने उन्हें राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपनी कला का प्रदर्शन किया।
तगाराम ने फ्रांस, स्पेन, इटली, जर्मनी और अमेरिका सहित कई देशों में अपनी जादुई प्रस्तुतियों से विदेशी दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया है। उन्होंने थार की कला को वैश्विक बनाया है।
उन्हें मरुधरा अवॉर्ड, आदिवासी सम्मान और महारावल गिरधर अवॉर्ड जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से भी नवाजा जा चुका है। उनका योगदान नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए प्रेरणास्रोत है।
स्वामी ब्रह्मदेव: सेवा और समर्पण की मिसाल
श्रीगंगानगर के स्वामी ब्रह्मदेव पिछले 45 वर्षों से समाजसेवा के कार्यों में जुटे हुए हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन दिव्यांग और दृष्टिहीन बच्चों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया है।
स्वामी जी ने वर्ष 1980 में श्रीजगदंबा अंध विद्यालय की स्थापना की थी। इस संस्थान में दृष्टिबाधित बच्चों को पूरी तरह निःशुल्क शिक्षा और छात्रावास की सुविधाएं प्रदान की जाती हैं।
उन्होंने मूक-बधिर विद्यालय, चैरिटेबल आई हॉस्पिटल और विकलांग पुनर्वास संस्थान की भी शुरुआत की है। इन संस्थानों के माध्यम से हजारों जरूरतमंदों को नया जीवन मिल रहा है।
स्वामी ब्रह्मदेव की संस्थाएं आज हजारों लोगों को शिक्षा, चिकित्सा और कृत्रिम अंग जैसी आवश्यक सुविधाएं प्रदान कर रही हैं। उनका सेवा कार्य मानवता की सच्ची मिसाल पेश करता है।
"कला और सेवा जब निस्वार्थ भाव से की जाती है, तो वह राष्ट्र की अनमोल धरोहर बन जाती है। इन विभूतियों का सम्मान राजस्थान की माटी का सम्मान है।"
सांस्कृतिक और सामाजिक गौरव का क्षण
राजस्थान की इन तीनों विभूतियों को मिलने वाला यह सम्मान प्रदेश की सांस्कृतिक समृद्धि और सेवा की गौरवशाली परंपरा को रेखांकित करता है। इससे राज्य का मान पूरे देश में बढ़ा है।
यह पुरस्कार न केवल इन व्यक्तियों की उपलब्धि है, बल्कि उन हजारों लोगों की आशाओं की जीत है जिन्हें इन्होंने अपनी कला और सेवा से प्रभावित किया है।
राष्ट्रपति भवन में आयोजित होने वाला यह समारोह राजस्थान के इन अनमोल रत्नों की तपस्या को मान्यता देने का एक ऐतिहासिक अवसर है, जो युवाओं को प्रेरित करेगा।
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