राजनीति

राजस्थान पंचायत चुना: राजस्थान में 31 जुलाई तक होंगे पंचायत-निकाय चुनाव: हाईकोर्ट

गणपत सिंह मांडोली · 22 मई 2026, 01:14 दोपहर
राजस्थान हाईकोर्ट ने पंचायत और निकाय चुनाव 31 जुलाई 2026 तक कराने का कड़ा आदेश दिया है।

जयपुर | राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रदेश की राजनीति और स्थानीय स्वशासन को लेकर एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार और चुनाव आयोग को पंचायत चुनाव कराने के कड़े निर्देश दिए हैं।

31 जुलाई 2026 तक चुनाव कराने का आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्रदेश में पंचायत और नगर निकाय चुनाव 31 जुलाई 2026 तक संपन्न हो जाने चाहिए। यह फैसला प्रदेश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एस. पी. शर्मा की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए यह आदेश जारी किया है। अदालत ने सरकार की दिसंबर 2026 तक की मांग को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया है।

इससे पहले अदालत ने 11 मई को इस मामले पर विस्तृत सुनवाई की थी। सुनवाई पूरी होने के बाद खंडपीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे अब सार्वजनिक कर दिया गया है।

ओबीसी आयोग की रिपोर्ट पर सख्त रुख

अदालत ने ओबीसी आयोग को भी अपनी कार्यप्रणाली में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं। आयोग को आगामी 20 जून तक अपनी विस्तृत रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपनी होगी ताकि प्रक्रिया आगे बढ़ सके।

चुनाव आयोग ने पूर्व में दलील दी थी कि ओबीसी आरक्षण का निर्धारण हुए बिना चुनाव प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती। अब आयोग की रिपोर्ट के बाद आरक्षण का मार्ग प्रशस्त होने की उम्मीद है।

सरकार ने कोर्ट में तर्क दिया था कि आरक्षण प्रक्रिया में काफी समय लगता है। हालांकि, हाईकोर्ट ने प्रशासन को समयसीमा का कड़ाई से पालन करने और रिपोर्ट पर तुरंत कार्रवाई करने का आदेश दिया है।

सरकार की दलीलें और कोर्ट की टिप्पणी

राज्य सरकार ने चुनावी देरी के पीछे कई व्यवहारिक और प्रशासनिक कारणों का हवाला दिया था। सरकार ने स्कूलों में चल रही परीक्षाओं और नए शैक्षणिक सत्र का उल्लेख अपनी दलीलों में किया था।

इसके अलावा, सरकारी अमले की भारी कमी और ईवीएम मशीनों की अनुपलब्धता को भी एक बड़ा कारण बताया गया था। सरकार ने इन संसाधनों को जुटाने के लिए अदालत से अतिरिक्त समय मांगा था।

प्रशासन ने "वन स्टेट-वन इलेक्शन" की अवधारणा का तर्क भी अदालत के सामने रखा। उनका कहना था कि सितंबर से दिसंबर के बीच कई निकायों का कार्यकाल खत्म हो रहा है, इसलिए चुनाव साथ हों।

अदालत ने इन दलीलों को सुनने के बाद कहा कि प्रशासनिक कठिनाइयों के आधार पर संवैधानिक कर्तव्यों को अनिश्चितकाल के लिए नहीं टाला जा सकता। समय पर चुनाव कराना एक अनिवार्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया है।

विपक्ष के तीखे हमले और राजनीतिक विवाद

इस कानूनी लड़ाई में पूर्व विधायक संयम लोढ़ा और गिरराज सिंह देवांदा ने भी अपनी बात रखी। उन्होंने सरकार पर जानबूझकर चुनाव टालने और लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ करने का गंभीर आरोप लगाया है।

"राज्य सरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का प्रयास कर रही है। संसाधनों का बहाना बनाकर स्थानीय चुनावों को टालना जनता के अधिकारों का हनन और उनके साथ विश्वासघात है।"

विपक्ष का मानना है कि सरकार हार के डर से चुनाव कराने से कतरा रही है। उनका तर्क है कि पिछले डेढ़ साल से प्रदेश के कई हिस्सों में स्थानीय जनप्रतिनिधि मौजूद नहीं हैं जिससे कार्य बाधित हैं।

प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति के कारण ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में विकास कार्य पूरी तरह ठप पड़े हैं। आम जनता को अपनी छोटी समस्याओं के लिए भी सरकारी अधिकारियों के चक्कर काटने को मजबूर होना पड़ रहा है।

पुरानी याचिकाओं का संदर्भ और कानूनी पेच

उल्लेखनीय है कि 14 नवंबर 2025 को हाईकोर्ट ने 439 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की थी। उस समय सरकार को 15 अप्रैल 2026 तक चुनाव कराने का लक्ष्य निर्धारित कर निर्देश दिया गया था।

जब सरकार उस समयसीमा में चुनाव कराने में विफल रही, तो उसने अदालत में नया प्रार्थना पत्र पेश किया। सरकार ने दिसंबर 2026 तक की लंबी मोहलत मांगी थी जिसे कोर्ट ने जनहित में ठुकरा दिया।

अब 31 जुलाई की नई डेडलाइन ने राज्य निर्वाचन विभाग में हलचल तेज कर दी है। विभाग को अब युद्ध स्तर पर मतदाता सूची पुनरीक्षण और वार्ड परिसीमन जैसे जटिल कार्यों को जल्द पूरा करना होगा।

राजस्थान हाईकोर्ट का यह निर्देश राज्य में स्थानीय स्वशासन की बहाली के लिए एक बड़ा कदम है। अब सभी की निगाहें 20 जून को आने वाली ओबीसी आयोग की रिपोर्ट पर टिकी हुई हैं।

यह आदेश न केवल सरकार के लिए एक चुनौती है, बल्कि यह सुनिश्चित करता है कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के सुचारू रूप से चलती रहें और जनता को उनका हक मिले।

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