राजनीति

शेखावत-भंडारी के अनकहे किस्से: राजस्थान राजनीति: अभिमन्यु राजवी ने साझा किया भैरोंसिंह शेखावत और सुंदर सिंह भंडारी का भावुक किस्सा, 'फ्रूटी' की वो यादें कर देंगी आंखें नम

मानवेन्द्र जैतावत · 13 अप्रैल 2026, 02:13 दोपहर
पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत के दोहिते अभिमन्यु सिंह राजवी ने सुंदर सिंह भंडारी की जयंती पर एक प्रेरक संस्मरण साझा किया है। यह कहानी राजनीति में सादगी और गुरु-शिष्य के अटूट रिश्तों की मिसाल पेश करती है।

जयपुर | राजस्थान की राजनीति में रिश्तों की गहराई और सादगी के किस्से अक्सर मिसाल बन जाते हैं। ऐसा ही एक अविस्मरणीय और आंखों को नम कर देने वाला संस्मरण पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत (बाबोसा) के दोहिते और भाजपा नेता अभिमन्यु सिंह राजवी ने साझा किया है। राजवी ने जनसंघ के संगठन महामंत्री और पूर्व राज्यपाल सुंदर सिंह भंडारी की जयंती पर उस दौर की यादें ताज़ा की हैं। यह वह समय था जब राजनीति में 'पद' नहीं, बल्कि 'मानवीय गरिमा' और 'आदर्श' सबसे ऊपर हुआ करते थे।

गुरु-शिष्य का अनूठा रिश्ता

अभिमन्यु सिंह राजवी लिखते हैं कि भैरोंसिंह शेखावत, सुंदर सिंह भंडारी को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। यह सम्मान तब से शुरू हुआ था जब 1952 में भंडारी संगठन महामंत्री थे और 'हुकुम' (शेखावत जी) एक नए-नवेले विधायक थे। शेखावत चाहे राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे हों या देश के उपराष्ट्रपति, भंडारी साहब के प्रति उनका सम्मान आजीवन वैसा ही बना रहा। 1952 के उस दौर में राजस्थान में जनसंघ अपनी जड़ें जमा रहा था और भंडारी साहब जैसे संगठक दिन-रात मेहनत कर रहे थे। उस समय भैरोंसिंह शेखावत ने एक प्रखर नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई थी। अभिमन्यु राजवी लिखते हैं कि उस समय के नेताओं में एक-दूसरे के प्रति जो सम्मान भाव था, वह आज दुर्लभ होता जा रहा है। भंडारी साहब का जीवन एक तपस्वी की तरह था।

'भंडारी नाना की फ्रूटी': अस्पताल की वो यादें

अभिमन्यु राजवी ने अपनी पोस्ट का शीर्षक 'भंडारी नाना की फ्रूटी' दिया है। उन्होंने बताया कि जब भंडारी साहब दिल्ली के अपोलो अस्पताल में अस्वस्थ थे, तब बाबोसा के आदेश पर अभिमन्यु और उनकी बहन मूमल प्रतिदिन उनका हालचाल जानने जाते थे। राजवी लिखते हैं, "चाहे अस्पताल हो या घर, जैसे ही हम भंडारी साहब के पास पहुँचते, वे तुरंत हमारे लिए एक फ्रूटी मँगवाते। वह फ्रूटी हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी थी।" यह उस महान राजनेता का बच्चों के प्रति निस्वार्थ स्नेह था। अस्पताल के उस शांत कमरे में जैसे ही बच्चे पहुँचते, भंडारी साहब के चेहरे पर एक चमक आ जाती थी। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी देश और संगठन के नाम कर दी थी, लेकिन बच्चों के लिए उनके पास हमेशा समय और प्रेम था।

जब बाबोसा ने चुटकी ली और भंडारी साहब हुए भावुक

इस संस्मरण का सबसे भावुक हिस्सा वह है जब एक बार भंडारी साहब ने शेखावत जी के सामने भावुक होकर कहा— "ये बच्चे (अभिमन्यु और मूमल) ज़रूर रोज़ मुझे संभालने आते हैं।" इस पर बाबोसा ने अपने चिर-परिचित मज़ाकिया अंदाज़ में उत्तर दिया। शेखावत जी ने कहा— "आप ही के तो बच्चे हैं भाईसाहब... और वैसे भी आपने भी तो इन्हें फ्रूटी का लालच दे रखा है।" शेखावत जी की इस बात पर भंडारी साहब ने जो जवाब दिया, वह आज भी अभिमन्यु राजवी के कानों में गूंजता है। भंडारी साहब ने कहा था: “अब और देने के लिए मेरे पास है ही क्या भैरोंसिंह जी?” यह वाक्य उस महान नेता की सादगी और अपरिग्रह को दर्शाता है। एक व्यक्ति जो कई मुख्यमंत्रियों का गुरु रहा, वह अपनी अंतिम अवस्था में कह रहा है कि उसके पास केवल प्रेम बचा है।

त्याग की पराकाष्ठा: ज्यूँ की त्यूँ धर दीनी चदरिया

यही एक आदर्श स्वयंसेवक का जीवन होता है। उन्होंने कबीर दास जी की पंक्तियों “ज्यूँ की त्यूँ धर दीनी चदरिया” के माध्यम से भंडारी साहब को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने अपना जीवन पूरी शुद्धता और त्याग के साथ जीया और कभी किसी लाभ की इच्छा नहीं की। सुंदर सिंह भंडारी जैसे नेताओं ने सत्ता के शीर्ष पर रहने के बावजूद कभी निजी लाभ नहीं देखा। उनका जीवन एक खुली किताब की तरह था, जिसमें केवल जनसेवा अंकित थी। आज जब राजनीति में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं हावी हैं, तब यह संवाद हमें नैतिकता की याद दिलाता है।

राजस्थान की विरासत का गौरव

यह किस्सा केवल एक परिवार की यादें नहीं हैं, बल्कि राजस्थान की उस राजनीतिक संस्कृति की झलक है जहाँ मतभेद हो सकते थे, लेकिन मनभेद नहीं। सुंदर सिंह भंडारी और भैरोंसिंह शेखावत के रिश्तों की यह कहानी आज के दौर के राजनेताओं के लिए एक दर्पण की तरह है। राजस्थान की मिट्टी ने हमेशा ऐसे नेतृत्व को जन्म दिया है जहाँ वैचारिक मतभेद होने पर भी व्यक्तिगत संबंधों में कड़वाहट नहीं आने दी जाती थी। अभिमन्यु राजवी का यह पोस्ट नई पीढ़ी के नेताओं के लिए एक बड़ा सबक और प्रेरणा का स्रोत है। यह कहानी हमें सिखाती है कि राजनीति केवल कुर्सी हासिल करने का जरिया नहीं है, बल्कि यह मानवीय मूल्यों को संजोने का एक माध्यम भी है। 'भंडारी नाना की फ्रूटी' उस निस्वार्थ प्रेम की कहानी है जो एक बुजुर्ग राजनेता ने अपने उत्तराधिकारियों को विरासत में दी।

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