सलूंबर | राजस्थान के सलूंबर जिले से एक बेहद डरावनी खबर सामने आ रही है, जिसने पूरे प्रदेश के चिकित्सा महकमे में हड़कंप मचा दिया है। यहां एक ऐसी रहस्यमय बीमारी ने पैर पसारे हैं, जिसका पैटर्न डॉक्टरों को भी हैरान कर रहा है।
मौतों का बढ़ता आंकड़ा और दहशत
सलूंबर जिले में बच्चों की रहस्यमय मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले कुछ दिनों में इस अज्ञात बीमारी ने 7 मासूमों की जिंदगी छीन ली है। शुरुआत लसाड़िया ब्लॉक से हुई थी, लेकिन अब यह जलारा तक फैल गई है।
लसाड़िया की घाटा पंचायत में पहले 5 बच्चों की जान गई थी। अब जलारा क्षेत्र में 2 और मासूमों ने दम तोड़ दिया है। इस खबर के बाद से पूरे इलाके के माता-पिता अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर बेहद चिंतित और डरे हुए हैं।
प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि जलारा, लसाड़िया से करीब 40 किलोमीटर दूर है। इतनी दूरी होने के बावजूद बीमारी का पैटर्न बिल्कुल एक जैसा पाया गया है, जो किसी बड़े खतरे का संकेत दे रहा है।
क्या है इस बीमारी का रहस्यमय पैटर्न?
इस बीमारी के लक्षणों ने चिकित्सा विशेषज्ञों को गहरी सोच में डाल दिया है। लसाड़िया में जिन 5 बच्चों (दीपक, लक्ष्मण, सीमा, राहुल और काजल) की मौत हुई, उनमें एक ही तरह के लक्षण देखे गए थे।
परिजनों के अनुसार, बच्चों को शाम या रात के समय हल्की उल्टी और दस्त की शिकायत होती थी। इसके कुछ ही समय बाद उनके शरीर में अचानक तेज अकड़न आने लगती थी। यह अकड़न इतनी गंभीर होती थी कि बच्चा तुरंत बेहोश हो जाता था।
हैरानी की बात यह है कि बेहोशी के बाद उन बच्चों को दोबारा होश ही नहीं आया। डॉक्टरों का कहना है कि यह लक्षण किसी न्यूरोलॉजिकल समस्या या किसी तीव्र संक्रमण की ओर इशारा करते हैं, जिसकी जांच अभी जारी है।
जलारा में हुई दो नई मौतें
चीफ मेडिकल एंड हेल्थ ऑफिसर (CMHO) महेंद्र कुमार ने बताया कि हाल ही में सलूंबर जिला अस्पताल में दो बच्चों को मृत अवस्था में लाया गया। इनमें से एक मासूम की उम्र महज 2 महीने थी और दूसरा साढ़े चार साल का था।
2 महीने के बच्चे को डायरिया की शिकायत थी। परिजनों ने उसे अस्पताल ले जाने के बजाय घर में रखी कोई पुरानी दवा दे दी थी। वहीं, साढ़े चार साल के बच्चे को उल्टी और बुखार था, जिसे पहले एक निजी क्लीनिक ले जाया गया था।
जब इन बच्चों की तबीयत बहुत ज्यादा बिगड़ गई, तब परिजन उन्हें सरकारी अस्पताल लेकर भागे। लेकिन अफसोस, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और डॉक्टरों ने उन्हें देखते ही मृत घोषित कर दिया। इन मौतों ने जलारा में सनसनी फैला दी है।
निजी क्लीनिक और लापरवाही का खतरा
स्वास्थ्य विभाग ने जांच में पाया है कि अधिकतर मामलों में परिजनों ने बच्चों का सही समय पर इलाज नहीं कराया। ग्रामीण इलाकों में लोग अक्सर 'झोलाछाप' डॉक्टरों या घर में रखी पुरानी दवाइयों पर भरोसा कर लेते हैं।
CMHO महेंद्र कुमार के अनुसार, शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना जानलेवा साबित हो रहा है। उन्होंने ग्रामीणों से अपील की है कि वे किसी भी निजी क्लीनिक के चक्कर में न पड़ें और सीधे सरकारी अस्पताल में डॉक्टर को दिखाएं।
सरकार अब इस बात की भी जांच कर रही है कि क्या निजी क्लीनिकों द्वारा दी गई गलत दवाओं के कारण बच्चों की स्थिति बिगड़ी। प्रशासन ने स्थानीय स्तर पर चल रहे अवैध क्लीनिकों पर भी नजर रखना शुरू कर दिया है।
भजनलाल सरकार का मेगा सर्वे अभियान
इस संकट की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के निर्देश पर स्वास्थ्य विभाग युद्धस्तर पर काम कर रहा है। पूरे उदयपुर संभाग में चिकित्सा व्यवस्था को अलर्ट मोड पर डाल दिया गया है।
चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की प्रमुख शासन सचिव गायत्री राठौड़ खुद इस पूरे मामले की निगरानी कर रही हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि बीमारी के स्रोत का पता लगाने के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं और संसाधनों की कमी नहीं आने दी जाएगी।
विभाग के निदेशक डॉ. रवि प्रकाश शर्मा ने बताया कि वर्तमान में 3690 टीमें मैदान में तैनात हैं। ये टीमें उदयपुर संभाग के प्रभावित और संभावित क्षेत्रों में घर-घर जाकर स्क्रीनिंग का काम कर रही हैं, ताकि किसी भी संदिग्ध मरीज को तुरंत ढूंढा जा सके।
52 हजार घरों की स्क्रीनिंग और ब्लड सैंपलिंग
अब तक स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने 52,000 से अधिक घरों का सर्वे पूरा कर लिया है। इस व्यापक सर्च ऑपरेशन के दौरान 275 ऐसे मरीज मिले हैं, जिनमें बीमारी के कुछ लक्षण दिखाई दे रहे थे।
इन 275 मरीजों में से 25 की हालत गंभीर पाई गई, जिन्हें तुरंत बड़े अस्पतालों में रेफर किया गया है। विभाग ने मच्छरजनित बीमारियों की संभावना को देखते हुए 2557 स्थानों पर एंटी-लार्वल गतिविधियां भी संचालित की हैं।
बीमारी की जड़ तक पहुंचने के लिए अब तक 1,796 ब्लड स्लाइड्स तैयार की गई हैं। इसके अलावा 94 सैंपल विस्तृत जांच के लिए लैब में भेजे गए हैं। रिपोर्ट आने के बाद ही साफ हो पाएगा कि यह कोई वायरस है या कुछ और।
प्रशासनिक सख्ती और निगरानी
एडिशनल कमिश्नर छोगाराम देवासी ने बताया कि प्रशासन पूरी तरह से सतर्क है। घाटा पंचायत में ही 17 मेडिकल टीमें तैनात हैं जो 24 घंटे काम कर रही हैं। पटवारी से लेकर चीफ सेक्रेटरी तक इस पूरी घटना पर नजर बनाए हुए हैं।
अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे प्रभावित गांवों में कैंप करें और लोगों को जागरूक करें। ग्रामीणों को बताया जा रहा है कि शरीर में अकड़न या उल्टी-दस्त को सामान्य न समझें और तुरंत मेडिकल टीम को सूचित करें।
प्रशासन ने यह भी सुनिश्चित किया है कि अस्पतालों में दवाओं और बेड की कोई कमी न हो। सलूंबर जिला अस्पताल में विशेष वार्ड बनाए गए हैं जहां संदिग्ध मरीजों को निगरानी में रखा जा रहा है।
क्या यह संक्रामक बीमारी है?
एक चौंकाने वाला तथ्य यह भी सामने आया है कि मरने वाले बच्चे एक-दूसरे से कभी नहीं मिले थे। उनके घरों के बीच की औसत दूरी भी लगभग 5 किलोमीटर थी। ऐसे में यह सवाल खड़ा हो गया है कि बीमारी कैसे फैल रही है।
विशेषज्ञों की एक टीम इस बात की जांच कर रही है कि क्या यह बीमारी पानी या भोजन के जरिए फैल रही है। लसाड़िया से जलारा तक 40 किमी के दायरे में मिट्टी और पानी के नमूने भी लिए जा रहे हैं ताकि किसी जहरीले तत्व की जांच की जा सके।
ग्रामीणों के बीच फैली अफवाहों को रोकने के लिए भी प्रशासन सक्रिय है। सोशल मीडिया पर निगरानी रखी जा रही है ताकि किसी भी तरह की गलत जानकारी से लोगों में घबराहट न फैले।
अभिभावकों के लिए जरूरी सावधानियां
स्वास्थ्य विभाग ने बच्चों के माता-पिता के लिए एक एडवाइजरी जारी की है। इसमें कहा गया है कि बच्चों को उबला हुआ पानी पिलाएं और ताजा खाना ही खिलाएं। यदि बच्चा सुस्त लगे या उसे हल्का बुखार हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
शरीर में अकड़न आना इस बीमारी का सबसे खतरनाक लक्षण है। यदि किसी बच्चे के हाथ-पांव अकड़ने लगें, तो उसे तुरंत अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में ले जाएं। समय पर इलाज ही इस रहस्यमय बीमारी से बचने का एकमात्र रास्ता है।
क्षेत्र के स्कूलों में भी बच्चों के स्वास्थ्य पर नजर रखी जा रही है। शिक्षकों को निर्देश दिए गए हैं कि यदि कोई बच्चा बीमार महसूस करे, तो उसके परिजनों और नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र को तुरंत सूचित किया जाए।
भविष्य की रणनीति और उम्मीद
राजस्थान सरकार इस मामले को लेकर काफी गंभीर है। चिकित्सा मंत्री ने आश्वासन दिया है कि जल्द ही बीमारी के कारणों का पता लगा लिया जाएगा। विशेषज्ञों की टीम लगातार डेटा का विश्लेषण कर रही है ताकि मौत के सटीक कारण तक पहुंचा जा सके।
सलूंबर की इस घटना ने ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे की चुनौतियों को भी उजागर किया है। सरकार अब दूर-दराज के गांवों में स्वास्थ्य सुविधाओं को और मजबूत करने पर विचार कर रही है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
फिलहाल पूरा सलूंबर जिला इस रहस्यमय बीमारी के साये में है। प्रशासन की टीमें दिन-रात काम कर रही हैं और उम्मीद जताई जा रही है कि सामूहिक प्रयासों से इस अज्ञात खतरे पर जल्द ही काबू पा लिया जाएगा।