सलूंबर | राजस्थान के सलूंबर और प्रतापगढ़ जिलों में पिछले 25 दिनों के भीतर 15 बच्चों की रहस्यमयी मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। स्वास्थ्य विभाग अब तक अंधेरे में तीर चला रहा था, लेकिन अब पहली बार पोस्टमार्टम के जरिए मौत की असल वजह तलाशने की कोशिश शुरू हुई है।
रहस्यमयी बीमारी का खौफनाक मंजर
सलूंबर जिले की लसाड़िया तहसील और प्रतापगढ़ जिले की पारसोला तहसील में मौत का यह सिलसिला पिछले तीन हफ्तों से लगातार जारी है।
इन इलाकों में रहने वाले आदिवासी परिवारों के मासूम बच्चे एक-एक कर काल के गाल में समा रहे हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में दहशत व्याप्त है।
हैरानी की बात यह है कि इन सभी मौतों का तरीका लगभग एक जैसा ही रहा है, जिससे स्वास्थ्य विभाग की चिंता काफी बढ़ गई है।
परिजनों के अनुसार, बच्चों को पहले सामान्य बुखार आता है, फिर उन्हें तेज उल्टियां शुरू होती हैं और कुछ ही घंटों में उनकी मौत हो जाती है।
इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की जान जाने के बावजूद अब तक प्रशासन किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सका है जो बेहद चिंताजनक है।
ग्रामीण इलाकों में चिकित्सा सुविधाओं की कमी और जागरूकता के अभाव के कारण भी स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है और मौतें रुक नहीं रही हैं।
पहली बार हुआ पोस्टमार्टम, रिपोर्ट का इंतजार
अब तक हुई 14 मौतों में से किसी का भी पोस्टमार्टम नहीं हो पाया था, क्योंकि परिजन धार्मिक मान्यताओं और अज्ञानता के कारण इसके लिए तैयार नहीं थे।
हालांकि, शुक्रवार को विभाग ने समझाइश कर पांच साल की मासूम रूसिया का शव पोस्टमार्टम के लिए भेजने में सफलता हासिल की है।
रूसिया की मौत के बाद उसके शरीर के विभिन्न अंगों के सैंपल लेकर एफएसएल जांच के लिए भेजे गए हैं ताकि मौत के कारणों का पता चले।
चिकित्सकों का मानना है कि इस एक पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने के बाद ही बीमारी की प्रकृति और उसके इलाज की दिशा तय हो सकेगी।
इससे पहले भी दो बच्चों को गंभीर स्थिति में उदयपुर के बड़े अस्पताल में रेफर किया गया था, लेकिन उन्हें भी बचाया नहीं जा सका।
फिलहाल स्वास्थ्य विभाग की टीमें प्रभावित गांवों में डेरा डाले हुए हैं और घर-घर जाकर सर्वे का काम किया जा रहा है ताकि नए मरीज खोजे जा सकें।
स्वास्थ्य विभाग की थ्योरी और दिमागी बुखार का डर
सीएमएचओ महेंद्र परमार ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि बच्चों की मौत के पीछे दिमागी बुखार यानी एन्सेफलाइटिस एक बड़ा कारण हो सकता है।
इसके अलावा क्षेत्र में मलेरिया के प्रकोप की भी आशंका जताई जा रही है, क्योंकि बारिश के बाद मच्छरों का प्रकोप इस इलाके में काफी बढ़ गया है।
सीएमएचओ महेंद्र परमार ने कहा, बच्चों में उल्टियां आना, तेज बुखार, सिरदर्द, दौरे पड़ना और बेहोशी जैसे लक्षण दिख रहे हैं, जो दिमागी बुखार की ओर इशारा करते हैं।
उन्होंने आगे बताया कि पोस्टमार्टम की विस्तृत रिपोर्ट आने के बाद ही इन लक्षणों की चिकित्सकीय पुष्टि हो पाएगी और सही उपचार शुरू किया जाएगा।
स्वास्थ्य विभाग ने ग्रामीणों से अपील की है कि वे किसी भी बच्चे को बुखार आने पर उसे तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र लेकर आएं और देरी न करें।
देसी इलाज और झाड़-फूंक के चक्कर में समय बर्बाद करना बच्चों की जान पर भारी पड़ रहा है, इसलिए आधुनिक चिकित्सा पर भरोसा करना जरूरी है।
ग्रामीणों में दहशत और चिकित्सा सुविधाओं पर सवाल
लसाड़िया और पारसोला तहसील के गांवों में सन्नाटा पसरा हुआ है और माता-पिता अपने बच्चों को घर से बाहर भेजने में भी डर महसूस कर रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर समय रहते स्वास्थ्य विभाग ने गंभीरता दिखाई होती, तो शायद इतने बच्चों की जान नहीं जाती।
गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर डॉक्टरों और दवाओं की कमी को लेकर भी ग्रामीणों में भारी रोष देखा जा रहा है जो स्वाभाविक भी है।
कई परिवारों ने तो डर के मारे अपने बच्चों को दूसरे सुरक्षित रिश्तेदारों के घर भेज दिया है ताकि वे इस रहस्यमयी बीमारी से बच सकें।
प्रशासन अब जाकर हरकत में आया है और प्रभावित क्षेत्रों में फॉगिंग और कीटनाशकों के छिड़काव का काम युद्ध स्तर पर शुरू किया गया है।
स्वच्छता अभियान और शुद्ध पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए भी स्थानीय निकायों को सख्त निर्देश जारी किए गए हैं ताकि संक्रमण न फैले।
क्या है बचाव के रास्ते और आगे की रणनीति?
विशेषज्ञों का कहना है कि दिमागी बुखार से बचने के लिए बच्चों को मच्छरों से बचाना और उन्हें पूरी आस्तीन के कपड़े पहनाना बेहद आवश्यक है।
साथ ही, बासी भोजन और गंदा पानी पीने से भी बच्चों को बचाना चाहिए, क्योंकि इससे संक्रमण फैलने का खतरा सबसे अधिक रहता है।
सरकार ने अब जिला स्तर पर एक टास्क फोर्स का गठन किया है जो हर दिन की रिपोर्ट सीधे जयपुर मुख्यालय को भेजेगी ताकि निगरानी हो सके।
उम्मीद जताई जा रही है कि अगले कुछ दिनों में एफएसएल रिपोर्ट आने के बाद इस रहस्यमयी मौत के तांडव पर लगाम लगाने में कामयाबी मिलेगी।
इस संकट की घड़ी में प्रशासन और जनता के बीच बेहतर समन्वय ही मासूमों की जान बचाने का एकमात्र रास्ता नजर आ रहा है।
अगर सही समय पर सही इलाज मिल जाए, तो इन मौतों को रोका जा सकता है और परिवारों को उजड़ने से बचाया जा सकता है।
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