बाड़मेर | राजस्थान के बाड़मेर जिले में स्थित गिरल लिग्नाइट माइंस के बाहर चल रहा जन-आंदोलन अब एक बेहद गंभीर और निर्णायक मोड़ ले चुका है। बुधवार को आंदोलन के नौवें दिन भी श्रमिकों और ग्रामीणों का आक्रोश कम नहीं हुआ। भीषण गर्मी और तपती धूप की परवाह किए बिना सैकड़ों प्रदर्शनकारी धरना स्थल पर डटे हुए हैं।
आंदोलन का नौवां दिन और बिगड़ता स्वास्थ्य
शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी की तबीयत अचानक बिगड़ने से क्षेत्र में तनाव और चिंता बढ़ गई है। आंदोलन के आठवें दिन की रात, लगातार थकान और लू के थपेड़ों के कारण उनका स्वास्थ्य खराब हो गया। उन्हें तेज बुखार और डिहाइड्रेशन की शिकायत हुई।
सूचना मिलते ही राजकीय अस्पताल से डॉक्टरों की टीम मौके पर पहुंची। धरना स्थल पर ही विधायक का प्राथमिक उपचार किया गया। डॉक्टरों ने उन्हें आराम करने और अस्पताल में भर्ती होने की सलाह दी थी, लेकिन भाटी ने धरना छोड़ने से साफ इनकार कर दिया।
विधायक ने स्पष्ट किया कि जब तक ग्रामीणों और श्रमिकों की जायज मांगें पूरी नहीं होतीं, वे पीछे नहीं हटेंगे। उनके इस फैसले ने आंदोलनकारियों में नई ऊर्जा भर दी है। अब ग्रामीण और भी मजबूती के साथ अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं।
क्यों सुलग रही है गिरल माइंस में विरोध की आग?
यह आंदोलन केवल श्रमिकों की छंटनी के खिलाफ नहीं है। यह पिछले कई वर्षों से संचित हो रहे जन-आक्रोश का परिणाम है। माइंस प्रबंधन द्वारा स्थानीय श्रमिकों को काम से निकाले जाने और वेतन विसंगतियों को लेकर भारी रोष है।
स्थानीय रोजगार और वेतन विसंगति का मुद्दा
ग्रामीणों का आरोप है कि कंपनी ने सीएसआर के तहत क्षेत्र के विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य के बड़े दावे किए थे। लेकिन धरातल पर कोई काम नजर नहीं आ रहा है। स्थानीय युवाओं को रोजगार देने के बजाय बाहरी लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है।
"जब तक ग्रामीणों और श्रमिकों की जायज मांगें पूरी नहीं होतीं, मैं यहां से पीछे नहीं हटूंगा। यह लड़ाई हमारे अस्तित्व और स्थानीय अधिकारों की है।" - रविंद्र सिंह भाटी
सीएसआर और बुनियादी सुविधाओं का अभाव
खनन क्षेत्र के आसपास के गांवों में आज भी सड़क, शुद्ध पेयजल और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। खनन के कारण उड़ने वाली धूल और प्रदूषण से लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन उनकी आवाज को दबाने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि माइंस से निकलने वाले संसाधनों पर पहला हक स्थानीय लोगों का है। वे प्रदूषण के मुआवजे और सुरक्षा के ठोस इंतजाम की मांग कर रहे हैं।
निष्कर्ष: प्रशासन की चुप्पी और भविष्य की राह
वर्तमान में स्थिति अत्यंत संवेदनशील बनी हुई है। एक ओर प्रशासन और कंपनी प्रबंधन वार्ता के जरिए बीच का रास्ता निकालने की कोशिश में हैं। वहीं दूसरी ओर आंदोलनकारी अपनी सभी मांगें लिखित में माने जाने तक हटने को तैयार नहीं हैं।
विधायक भाटी की मौजूदगी ने इस आंदोलन को प्रदेश स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है। यदि जल्द ही कोई सकारात्मक समाधान नहीं निकला, तो यह आंदोलन और उग्र हो सकता है। फिलहाल प्रशासन और ग्रामीणों के बीच गतिरोध बरकरार है।
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