जयपुर | राजस्थान सरकार की महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य योजना आरजीएचएस वर्तमान में एक बड़े वित्तीय संकट के मुहाने पर खड़ी है, जिससे प्रदेश के लाखों लाभार्थियों की सेहत पर गंभीर संकट गहरा गया है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, अस्पतालों, डायग्नोस्टिक केंद्रों और दवा विक्रेताओं का लगभग 2200 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान पिछले आठ-नौ महीनों से लंबित है।
भुगतान संकट से चरमराई स्वास्थ्य सेवाएं
लंबे समय से बकाया राशि का भुगतान नहीं होने के कारण प्रदेश के निजी अस्पतालों ने 13 अप्रैल से आरजीएचएस के तहत मिलने वाली कैशलेस सेवाओं का पूर्ण बहिष्कार शुरू कर दिया है। इस विरोध प्रदर्शन के कारण राज्य के लाखों सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, जो नियमित वेतन कटौती के बावजूद मुफ्त इलाज के अधिकार से वंचित हैं।
मरीजों को जेब से देना पड़ रहा मोटा पैसा
निजी अस्पतालों द्वारा सेवाएं बंद किए जाने के बाद अब गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को मजबूरी में अपनी जेब से पैसे देकर निजी अस्पतालों में इलाज कराना पड़ रहा है। सितंबर 2025 में भी आंशिक रूप से सेवाएं बाधित हुई थीं, लेकिन इस बार का बहिष्कार अत्यंत व्यापक स्तर पर है, जिससे राज्य की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था लड़खड़ा गई है। पेंशनर्स के बीच इस स्थिति को लेकर भारी आक्रोश व्याप्त है, क्योंकि वे अपनी जीवन भर की जमा पूंजी अब इलाज के बिलों का भुगतान करने में खर्च करने को मजबूर हैं।
आईएमए ने मुख्यमंत्री से की त्वरित हस्तक्षेप की मांग
आईएमए राजस्थान के अध्यक्ष डॉ. महेश शर्मा ने इस गंभीर स्थिति पर चिंता जताते हुए वित्त विभाग, स्वास्थ्य विभाग और आरजीएचएस एजेंसी के बीच समन्वय की भारी कमी बताई है। जब तक सरकार बकाया भुगतान और पुरानी दरों में सुधार के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाती, तब तक निजी अस्पतालों का यह बहिष्कार और विरोध जारी रहेगा।
पुरानी दरों और कम पैकेज पर बढ़ा विरोध
आईएमए सचिव डॉ. एन. के. अग्रवाल का कहना है कि वर्तमान में वर्ष 2014 की पुरानी सीजीएचएस दरें लागू हैं, जो आज की महंगाई के दौर में पूरी तरह से अव्यावहारिक हो चुकी हैं। अस्पताल संचालकों का कहना है कि पुरानी दरों पर इलाज करना अब संभव नहीं है, क्योंकि दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों में पिछले एक दशक में भारी बढ़ोतरी हुई है। अस्पतालों पर बढ़ता आर्थिक दबाव और कम पैकेज दरों के कारण कई छोटे अस्पताल अब बंद होने की कगार पर पहुंच गए हैं, जिससे स्वास्थ्य क्षेत्र में रोजगार पर भी संकट है। केमिस्ट एसोसिएशन ने भी दवाइयों की आपूर्ति रोकने की चेतावनी दी है, जिससे ओपीडी में आने वाले मरीजों को कैशलेस दवाएं मिलना भी लगभग बंद हो गया है।
बीमा मोड पर सरकार का विचार और नई चिंताएं
सरकार अब इस योजना को इंश्योरेंस मोड में ले जाने पर विचार कर रही है, लेकिन निजी अस्पतालों का मानना है कि इससे पारदर्शिता कम होगी और उनकी वित्तीय चिंताएं बढ़ेंगी। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से मांग की गई है कि वे एक उच्च स्तरीय समिति का गठन करें जो सभी पक्षों की सुनवाई कर इस गतिरोध को समाप्त करने की दिशा में कार्य करे। निष्कर्ष के तौर पर, यदि सरकार ने जल्द ही भुगतान प्रक्रिया को सुव्यवस्थित नहीं किया तो प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह ठप हो सकती हैं और आम जनता का विश्वास योजना से उठ जाएगा।
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