नई दिल्ली | भारत का समुद्री क्षेत्र आज एक नए युग में प्रवेश कर चुका है। देश की विशाल समुद्री तटरेखा, जो लगभग 11,099 किलोमीटर लंबी है, अब केवल भौगोलिक सीमा नहीं बल्कि आर्थिक प्रगति का मुख्य इंजन बन गई है।
भारत सरकार द्वारा मार्च 2015 में शुरू किया गया 'सागरमाला' कार्यक्रम इस रूपांतरण की धुरी रहा है। इसका प्राथमिक उद्देश्य बंदरगाहों के नेतृत्व में विकास को बढ़ावा देना और रसद लागत को कम करना है।
हालिया आंकड़ों के अनुसार, सागरमाला के तहत कुल 845 परियोजनाओं की पहचान की गई है। इन परियोजनाओं की अनुमानित लागत ₹6.06 लाख करोड़ है, जो भारत के बुनियादी ढांचे के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
परियोजनाओं की प्रगति और वर्तमान स्थिति
इन 845 परियोजनाओं में से, 24 मार्च 2026 तक ₹1.57 लाख करोड़ की लागत वाली 315 परियोजनाएँ सफलतापूर्वक पूर्ण हो चुकी हैं। यह इस कार्यक्रम की तीव्र क्रियान्वयन क्षमता का प्रमाण है।
वर्तमान में, 210 परियोजनाएँ क्रियान्वयन के विभिन्न चरणों में हैं। इसके अतिरिक्त, 320 अन्य परियोजनाओं को नियोजन और निविदा स्तर पर रखा गया है, जो भविष्य के विस्तार की नींव रख रही हैं।
बंदरगाहों के आधुनिकीकरण ने भारत की वैश्विक व्यापारिक स्थिति को मजबूत किया है। देश के प्रमुख बंदरगाहों ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान 915.17 मिलियन टन कार्गो का रिकॉर्ड संचालन किया है।
बंदरगाह आधुनिकीकरण और नई क्षमता
सागरमाला का पहला स्तंभ बंदरगाहों का आधुनिकीकरण है। इसके तहत मौजूदा बंदरगाहों की क्षमता बढ़ाई जा रही है और नए अत्याधुनिक बंदरगाहों का विकास किया जा रहा है।
7 तटीय बर्थ परियोजनाओं के पूरा होने से देश की कार्गो हैंडलिंग क्षमता में 9.84 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) की वृद्धि हुई है। इससे माल की लोडिंग और अनलोडिंग में लगने वाला समय कम हुआ है।
बंदरगाहों पर परिचालन दक्षता में सुधार एक बड़ी उपलब्धि है। औसत पोत टर्नअराउंड समय, जो 2014 में 96 घंटे हुआ करता था, अब घटकर 49.5 घंटे रह गया है।
कनेक्टिविटी और लॉजिस्टिक दक्षता
सागरमाला का दूसरा महत्वपूर्ण घटक बंदरगाह कनेक्टिविटी है। इसका उद्देश्य बंदरगाहों को देश के आंतरिक हिस्सों (हिन्टरलैंड) से सड़क, रेल और जलमार्गों के माध्यम से जोड़ना है।
बेहतर कनेक्टिविटी से न केवल परिवहन लागत कम हुई है, बल्कि व्यापार करने में आसानी (Ease of Doing Business) में भी सुधार हुआ है। मल्टीमॉडल परिवहन नेटवर्क अब एक वास्तविकता बन रहा है।
कोलकाता के श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट में ऐतिहासिक बास्कुल पुल का नवीनीकरण इसी दिशा में एक बड़ा कदम है। यह पुल बंदरगाह के भीतर कार्गो और वाहनों की सुचारू आवाजाही सुनिश्चित करेगा।
तटीय समुदायों का सशक्तिकरण
सागरमाला केवल बुनियादी ढांचे के बारे में नहीं है, बल्कि यह तटीय समुदायों के जीवन स्तर को सुधारने के बारे में भी है। कौशल विकास इसके केंद्र में है।
दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना के तहत 7,600 से अधिक युवाओं को प्रशिक्षित किया गया है। इनमें से 3,100 से अधिक लोगों को समुद्री क्षेत्र में रोजगार प्राप्त हुआ है।
मत्स्यपालन क्षेत्र में भी बड़े निवेश किए गए हैं। ₹1,057 करोड़ की लागत से 11 मत्स्य बंदरगाह परियोजनाएँ पूरी की गई हैं, जिससे 30,000 से अधिक मछुआरों को सीधा लाभ मिला है।
अंतर्देशीय जलमार्गों का अभूतपूर्व विकास
भारत ने अपने जलमार्गों की क्षमता को पहचानने में लंबी छलांग लगाई है। अंतर्देशीय जलमार्गों के माध्यम से कार्गो परिवहन में लगभग 700% की वृद्धि दर्ज की गई है।
वित्त वर्ष 2013-14 में यह केवल 18.10 MTPA था, जो अब बढ़कर 145.50 MTPA हो गया है। यह सड़क और रेल नेटवर्क पर दबाव कम करने के लिए एक पर्यावरण अनुकूल विकल्प है।
शहरी जल परिवहन को बढ़ावा देने के लिए 29 रो-पैक्स और यात्री फेरी परियोजनाएँ शुरू की गई हैं। इनमें से 17 परियोजनाएँ पूरी हो चुकी हैं, जिनसे लाखों यात्रियों को लाभ हो रहा है।
सागरमाला 2.0: भविष्य का रोडमैप
सरकार अब सागरमाला 2.0 की ओर कदम बढ़ा रही है। यह चरण 'मैरीटाइम इंडिया विज़न 2030' और 'समुद्री अमृत काल विज़न 2047' के लक्ष्यों को प्राप्त करने पर केंद्रित होगा।
सागरमाला 2.0 के लिए ₹85,482 करोड़ के बजटीय समर्थन का प्रस्ताव है। इसका मुख्य लक्ष्य ₹3.6 लाख करोड़ के कुल निवेश को प्रोत्साहित करना और भारत को वैश्विक समुद्री हब बनाना है।
यह नया चरण नवाचार, डिजिटल परिवर्तन और हरित बंदरगाहों (Green Ports) के विकास पर विशेष ध्यान देगा। इससे भारत की रसद लागत को वैश्विक मानकों के करीब लाने में मदद मिलेगी।
संस्थागत ढांचा और वित्तीय सहायता
कार्यक्रम की सफलता के पीछे एक मजबूत संस्थागत ढांचा है। राष्ट्रीय सागरमाला शीर्ष समिति (NSAC) नीतिगत मार्गदर्शन प्रदान करती है, जबकि राज्य समितियाँ क्षेत्रीय क्रियान्वयन सुनिश्चित करती हैं।
सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड (SMFCL) की स्थापना एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह समुद्री क्षेत्र पर केंद्रित भारत की पहली नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) है।
SMFCL ने पहले ही ₹4,300 करोड़ के ऋण अनुमोदनों को स्वीकृति दी है। यह वित्तीय संस्थान बंदरगाहों और शिपिंग अवसंरचना के लिए आवश्यक पूंजी उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
सुरक्षा और आधुनिक तकनीक
बंदरगाहों की सुरक्षा को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। मुंबई पोर्ट के पिर पाउ टर्मिनल पर ₹52.69 करोड़ की अग्निशमन सुविधा परियोजना इसका एक उदाहरण है।
तकनीकी नवाचारों और डिजिटल प्रणालियों के माध्यम से बंदरगाहों के कामकाज को पारदर्शी और तेज बनाया गया है। इससे भारतीय बंदरगाहों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में भारी इजाफा हुआ है।
आज भारत के 9 बंदरगाह दुनिया के शीर्ष 100 बंदरगाहों की सूची में शामिल हैं। विशाखापत्तनम पोर्ट जैसे बंदरगाह अब कंटेनर ट्रैफिक के मामले में वैश्विक दिग्गजों को टक्कर दे रहे हैं।
निष्कर्ष
सागरमाला कार्यक्रम ने पिछले एक दशक में भारत के समुद्री परिदृश्य को पूरी तरह से बदल दिया है। यह पहल न केवल व्यापार को सुगम बना रही है, बल्कि लाखों लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा कर रही है।
अनुमान है कि इस कार्यक्रम के माध्यम से कुल एक करोड़ रोजगार के अवसर पैदा होंगे। इसमें 40 लाख प्रत्यक्ष और 60 लाख अप्रत्यक्ष रोजगार शामिल हैं, जो तटीय क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को बदल देंगे।
विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने में सागरमाला की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। सुव्यवस्थित बुनियादी ढांचा और कुशल रसद प्रणाली भारत को एक वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनाने की दिशा में अग्रसर है।