राजस्थान

बेटी ने तोड़ी परंपरा, दी मुखाग्नि: सवाई माधोपुर: जब बेटी बनी 'बेटा', बृजेश कंवर ने पिता को मुखाग्नि देकर तोड़ी सदियों पुरानी परंपरा

बलजीत सिंह शेखावत · 16 अप्रैल 2026, 06:10 शाम
राजस्थान के सवाई माधोपुर में बृजेश कंवर ने अपने पिता की अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए उन्हें मुखाग्नि दी। उन्होंने न केवल कंधा दिया बल्कि रूढ़ियों को तोड़कर एक नई मिसाल पेश की।

सवाई माधोपुर | राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले से एक ऐसी भावुक कर देने वाली तस्वीर सामने आई है, जिसने समाज की सदियों पुरानी रूढ़िवादी परंपराओं को झकझोर कर रख दिया है। यहाँ एक बेटी ने अपने पिता का अंतिम संस्कार कर बेटे का फर्ज निभाया। बाल मंदिर कॉलोनी के निवासी ठाकुर मोहन सिंह राजावत का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह लंबे समय से ब्रेन कैंसर से जूझ रहे थे। उनकी अंतिम यात्रा में जो हुआ, उसने हर किसी का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया।

पिता का अटूट विश्वास

मोहन सिंह राजावत अक्सर कहा करते थे कि उनकी बेटी बृजेश कंवर किसी बेटे से कम नहीं है। उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनकी विदाई भी उनकी बेटी ही करे। बृजेश ने अपने पिता के उस विश्वास को टूटने नहीं दिया।

जैसे ही घर से अर्थी उठी, बृजेश कंवर ने आगे बढ़कर अपने पिता के पार्थिव शरीर को कंधा दिया। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं। यह समाज की पुरानी सोच पर एक बड़ा प्रहार था।

श्मशान में टूटीं परंपराएं

श्मशान घाट पर जब मुखाग्नि देने का समय आया, तो चारों ओर सन्नाटा छा गया। बृजेश ने कांपते हाथों से अपने पिता को मुखाग्नि दी। हर कदम पर वह इतिहास रच रही थीं और एक नई परंपरा की नींव रख रही थीं।

इस कठिन समय में बृजेश के ससुराल पक्ष ने उनका पूरा साथ दिया। उनके पति और ससुर ने उन्हें इस फैसले के लिए न केवल अनुमति दी, बल्कि उनका हौसला भी बढ़ाया। यही इस कहानी का सबसे प्रेरणादायक पहलू है।

एक नई सोच की शुरुआत

बृजेश कंवर राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार और 'The True Mic' के एडिटर भंवर पुष्पेंद्र की पत्नी हैं। उनके इस साहसी कदम ने यह साबित कर दिया कि रिश्ते केवल खून से नहीं, बल्कि संस्कारों से निभाए जाते हैं।

सवाई माधोपुर की यह घटना अब केवल एक समाचार नहीं है, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन की शुरुआत है। यह संदेश देता है कि बेटियां अवसर मिलने पर हर जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा के साथ निभा सकती हैं।

समाज के प्रबुद्ध लोगों ने इस पहल का स्वागत किया है और इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक मील का पत्थर बताया है। यह घटना साबित करती है कि प्रेम और कर्तव्य किसी लिंग के मोहताज नहीं होते।

यह कहानी उन सभी के लिए एक सीख है जो आज भी बेटियों को बोझ समझते हैं। बृजेश ने दिखा दिया कि अंतिम विदाई देने का अधिकार उसी का है, जिसने जीवन भर निस्वार्थ प्रेम किया हो।

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