सीहोर | मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के आष्टा अंचल में करीब 150 साल से अधिक समय से विजयादशमी का पर्व तीन दिनों तक मनाया जाता है।
इस परंपरा के तहत आष्टा, खड़ी हाट और कजलास में अलग-अलग दिनों में रावण दहन का आयोजन किया जाता है।
तीन दिनों तक जलते हैं रावण के पुतले
विजयादशमी पर पहले दिन आष्टा में 71 फीट ऊंचे रावण का दहन किया जाता है।
उत्सव के दूसरे दिन खड़ी हाट में 25 फीट ऊंचे पुतले का दहन होता है।
तीसरे दिन कजलास में 20 से 25 फीट के रावण का पुतला जलाया जाता है।
इन तीनों आयोजनों में रामलीला, चल समारोह और आतिशबाजी के बीच हजारों लोग शामिल होते हैं।
150 साल पुरानी अनूठी परंपरा की वजह
पुराने समय में मनोरंजन के साधन बेहद सीमित हुआ करते थे।
त्योहार और रामलीला ही लोगों के मेल-मिलाप और मनोरंजन के मुख्य माध्यम थे।
एक ही दिन रावण दहन होने के कारण दूर-दराज के ग्रामीण उत्सव में नहीं पहुंच पाते थे।
इसी वजह से बुजुर्गों ने मिलकर दशहरा तीन दिन तक मनाने का निर्णय लिया था।
तैयारियों का स्वरूप और बदलाव
आष्टा के 76 वर्षीय कन्हैयालाल शर्मा के अनुसार, पहले दशहरे की तैयारी करीब एक महीने पहले शुरू होती थी।
आधे लोग पुतला निर्माण में जुटते थे, जबकि बाकी लोग रामलीला के पात्रों की तैयारी संभालते थे।
भजन मंडलियां लगातार भजन गाती थीं और कलाकारों के भोजन की व्यवस्था स्थानीय लोग मिलकर करते थे।
पूरे आयोजन का खर्च ग्रामीण आपस में बांटते थे, जबकि अब तैयारियां सात से 15 दिन में पूरी हो जाती हैं।
दशहरा मैदान और प्रमुख आयोजन
आष्टा में पहले पुरानी सब्जी मंडी के पास रावण दहन होता था, जिसे बाद में थाने के सामने नए दशहरा मैदान में स्थानांतरित कर दिया गया।
यहां 51 फीट से शुरू हुई परंपरा में अब 61 से 71 फीट तक के पुतले जलाए जाते हैं।
खड़ी के रमेश वर्मा के अनुसार, खड़ी हाट में चल समारोह निकलता है और आसपास के 15 से अधिक गांवों के लोग जुटते हैं।
कजलास में तीसरे दिन रामलीला के मंचन के पश्चात रावण का दहन संपन्न होता है।
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