रेवदर | अर्बुदारण्य की पावन धरा नंदगांव में श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा की ओर से आयोजित ‘श्री सुरभि हरिहर चातुर्मास आराधना महोत्सव’ में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानन्द सरस्वती जी महाराज ने रामकथा पर विशेष प्रवचन दिया।
गो ऋषि दत्तशरणानंद जी महाराज के सानिध्य में हुए इस कार्यक्रम में उन्होंने धर्म, कर्तव्य, लोक-परलोक एवं पुत्रधर्म का प्रभावी विवेचन किया।
धर्म और कर्तव्य का महत्व
शंकराचार्य जी ने कहा कि मनुष्य जीवन केवल इस लोक में सुख प्राप्त करने के लिए नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इसका मुख्य उद्देश्य लोक में रहते हुए अपने परलोक को संवारना है।
उन्होंने धर्म को वेद एवं शास्त्रों पर आधारित जीवन का शाश्वत मार्ग बताया।
राम का उदाहरण
भगवान राम के वनगमन प्रसंग की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान राम ने राज्याभिषेक और वनवास, दोनों को समान भाव से स्वीकार किया।
उनके लिए पिता की आज्ञा और धर्म सर्वोपरि था। शंकराचार्य ने कहा, "अधिकार से पहले कर्तव्य और सुख से पहले धर्म को स्थान देना ही रामत्व है।"
लोक-परलोक का संबंध
शंकराचार्य जी ने लोक-परलोक का संबंध समझाने के लिए एक राजा और पंडित का दृष्टांत सुनाया।
उन्होंने बताया कि जिस प्रकार पंडित ने पांच वर्ष के शासनकाल में अपने भविष्य के निवास को सुरक्षित बनाने की तैयारी की, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने वर्तमान जीवन में सत्कर्म करने चाहिए। इन सत्कर्मों से ही परलोक संवरता है।
जीवन का सार
उन्होंने कहा कि जीवन क्षणभंगुर है, लेकिन मनुष्य के कर्म और उसकी कीर्ति लंबे समय तक याद किए जाते हैं।
रामकथा हमें धर्म, मर्यादा, माता-पिता एवं गुरुजनों का सम्मान करने और एक कर्तव्यनिष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा देती है।
इस अवसर पर श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा के कार्यकारी अध्यक्ष रघुनाथसिंह राजपुरोहित, सीईओ आलोक सिंहल, वरिष्ठ ट्रस्टी देवाराम जागरवाल, भरतसिंह बसंत, ब्रह्मदत्त राजपुरोहित, रामचन्द्र नेहरा, दिनेश बालेरा एवं जयेश भाई सहित महोत्सव से जुड़े कई पदाधिकारी एवं गणमान्यजन उपस्थित रहे।
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