राजस्थान

आसक्ति का त्याग ही मोक्ष: आसक्ति का त्याग ही मोक्ष का प्रथम सोपान: शंकराचार्य

गणपत सिंह मांडोली · 04 अगस्त 2026, 07:05 शाम
नंदगांव में चातुर्मास महोत्सव में शंकराचार्य जी ने माण्डूक्य उपनिषद् पर प्रवचन देते हुए कहा कि आत्मबोध और वैराग्य ही मोक्ष का मार्ग है।

रेवदर | द्वारका शारदापीठाधीश्वर परम पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री सदानंद सरस्वतीजी महाराज ने नंदगांव में आयोजित श्री सुरभि हरिहर चातुर्मास आराधना महोत्सव में धर्मोपदेश दिया। उन्होंने माण्डूक्य उपनिषद् के गूढ़ रहस्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आत्मबोध और वैराग्य ही मनुष्य को मोक्ष के परम लक्ष्य तक पहुंचाते हैं।

आत्मबोध और वैराग्य ही मोक्ष का मार्ग

यह महोत्सव परम श्रद्धेय गोऋषि स्वामी श्री दत्तशरणानंदजी महाराजश्री के सानिध्य में अर्बुदारण्य की पावन भूमि पर गोमाताओं के मध्य श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा द्वारा आयोजित किया गया।

शंकराचार्य जी ने श्रीमद्भागवत के मंगलाचरण श्लोक "अर्थेष्वभिज्ञः स्वराट्" की व्याख्या करते हुए कहा कि परमात्मा सर्वज्ञ, सर्वस्वतंत्र एवं समस्त सृष्टि के एकमात्र नियन्ता हैं।

उन्होंने बताया कि परमात्मा प्रत्येक जीव के कर्म, उसके फल तथा फल प्रदान करने के उपयुक्त देश, काल और परिस्थिति से पूर्णतः परिचित रहते हैं। वे किसी पर आश्रित नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जगत के स्वतंत्र अधिष्ठाता हैं।

आसक्ति का त्याग ही सच्चा वैराग्य

अपने उद्बोधन में शंकराचार्य जी महाराज ने कहा कि ब्रह्मविद्या का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को गुण, उपाधि एवं अनात्म पदार्थों के मिथ्या अभिमान से मुक्त कर उसके शुद्ध आत्मस्वरूप का बोध कराना है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि त्याग का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, बल्कि अनात्म वस्तुओं के प्रति आसक्ति का त्याग करना है। यही सच्चा वैराग्य मनुष्य को अमृतत्व एवं मोक्ष की दिशा में अग्रसर करता है।

इंद्रियों पर संयम आवश्यक

उन्होंने कहा कि ईश्वर ने मनुष्य को विवेकयुक्त बुद्धि एवं इन्द्रियाँ प्रदान की हैं। यद्यपि इन्द्रियाँ स्वभावतः विषयों की ओर आकर्षित होती हैं, किन्तु मनुष्य में उन्हें संयमित कर अंतर्मुख बनाने की अद्भुत क्षमता है।

जब मन विषय-वासनाओं से हटकर परमात्मा के चिंतन में प्रवृत्त होता है, तभी आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।

सांसारिक संबंधों की अनित्यता

सांसारिक संबंधों की अनित्यता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य जितना अधिक मोह और आसक्ति में बंधता है, उतना ही दुःखों के बंधनों को स्वीकार करता जाता है।

उन्होंने कहा कि वेदान्त संसार के व्यवहार का निषेध नहीं करता, बल्कि संबंधों में निहित मोह का त्याग करने का संदेश देता है। यही विवेक मनुष्य को दुःख से मुक्त कर आत्मिक शांति एवं आनंद की अनुभूति कराता है।

प्रवचन के समापन पर पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने कहा कि जिस मन से मनुष्य संसार का चिंतन करता है, वही मन यदि परमात्मा की ओर उन्मुख हो जाए तो वही मोक्ष का साधन बन जाता है।

इस अवसर पर गोवत्स राधाकृष्णजी महाराज, ऋषिचैतन्यजी महाराज, रघुनाथसिंह शिवतलाव, उत्सव मनोरथी नेमारामजी अमराजी आमली, कथा मनोरथी चम्पालाल सायला, बाबूलालजी तारारामजी जेतपुरा, भभूताराम पुरोहित, कैलाश सांथू, मिश्रीमल विजयवाड़ा, बलवंतराज अनखोल, सीईओ आलोक सिंहल, हरिभगवान बंग, सांवलाराम वागावास, बिहारीलाल बसंत सहित हजारों गोभक्त उपस्थित रहे।

321 श्रद्धालुओं ने किया गौ-पूजन

चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत रविवार को रानीवाड़ा के बोहरा परिवार के नेतृत्व में 321 श्रद्धालुओं का विशाल जत्था नंदगांव स्थित केशुआ गौशाला पहुंचा।

श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से गौमाता का पूजन कर आरती उतारी तथा गौसेवा का संकल्प लिया।

इसके पश्चात सभी श्रद्धालु द्वारकाधीश शंकराचार्य जी महाराज के दर्शन के लिए पहुंचे, जहां उन्होंने कथा श्रवण एवं संध्या आरती में सहभागिता कर आध्यात्मिक वातावरण का दिव्य अनुभव प्राप्त किया।

यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं ने दत्त शरणानंद महाराज के दर्शन एवं आशीर्वाद भी प्राप्त किए।

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