रेवदर | अर्बुदारण्य की पावन धरा स्थित श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा की ओर से नंदगांव में 'श्री सुरभि हरिहर चातुर्मास आराधना महोत्सव' का आयोजन किया जा रहा है। इस महोत्सव में गो ऋषि दत्त शरणानंद जी महाराज के सानिध्य में जगतगुरु शंकराचार्य सदानंद सरस्वती जी महाराज ने प्रवचन दिया।
चातुर्मास महोत्सव में धर्म का संदेश
शंकराचार्य जी ने रामायण के प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से धर्म, कर्म, त्याग और कीर्ति के गूढ़ रहस्यों पर प्रकाश डाला।
उन्होंने श्रद्धालुओं को जीवन के वास्तविक मूल्यों को समझने के लिए प्रेरित किया।
श्रीराम राज्याभिषेक और मंथरा की कुटिल चाल
महाराज जी ने अयोध्या में श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियों का जीवंत वर्णन किया।
उन्होंने बताया कि कैसे पूरी अयोध्या नगरी उत्सव के आनंद में डूबी हुई थी।
महाराज दशरथ अपने प्रिय पुत्र श्रीराम को युवराज बनाने का संकल्प ले चुके थे।
कैकेयी को भड़काया
इसी उत्सव के बीच, मंथरा की कुटिल बुद्धि ने एक विनाशकारी योजना बनाई।
मंथरा ने रानी कैकेयी को भड़काया और उन्हें पूर्व में मिले दो वरदानों की याद दिलाई।
उसने कैकेयी को भरत के लिए अयोध्या का राज्य और श्रीराम के लिए चौदह वर्षों का वनवास मांगने के लिए उकसाया।
कर्म की गहन गति का सिद्धांत
शंकराचार्य जी ने कहा कि मंथरा ने केवल अपने तत्कालिक स्वार्थ को देखा।
उसने अपने निर्णय के दूरगामी और विनाशकारी परिणामों पर बिल्कुल भी विचार नहीं किया।
उन्होंने भगवद्गीता के वचन “गहना कर्मणो गतिः” का उल्लेख करते हुए समझाया कि मनुष्य के हर कर्म का प्रभाव बहुत दूर तक जाता है।
धर्म की सच्ची परिभाषा
धर्म की व्याख्या करते हुए महाराज जी ने कहा, “यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः”।
इसका अर्थ है कि जिससे लौकिक और परम कल्याण की सिद्धि होती है, वही सच्चा धर्म है।
श्रीराम ने अपने पिता के वचन और रघुकुल की मर्यादा की रक्षा के लिए राजपाट का भी त्याग कर दिया, जो धर्म का सर्वोच्च उदाहरण है।
सद्कर्मों से मिलती है अमर कीर्ति
उन्होंने कहा कि धन, पद, शरीर और यौवन, यह सब कुछ नश्वर है और एक दिन समाप्त हो जाएगा।
लेकिन, अच्छे कर्मों से अर्जित कीर्ति ही मनुष्य को हमेशा के लिए अमर बनाती है।
श्रीराम का वनवास ही अंततः अधर्मी रावण के वध और पृथ्वी पर धर्म की पुनः प्रतिष्ठा का मार्ग बना।
श्रद्धालुओं को धर्मपथ पर चलने का आह्वान
अंत में, महाराज जी ने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियां क्यों न आएं, कभी भी धर्म, सत्य और कर्तव्य का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।
महाराज जी बोले—धर्म की राह कठिन हो सकती है, लेकिन कीर्ति हमेशा अमर रहती है।
उन्होंने समझाया कि क्षणिक लाभ के बजाय सद्कर्म ही मनुष्य की स्थायी पहचान और सच्ची कीर्ति बनते हैं।