नीलू की कलम से: शेखाटी का माळ और नाळ

शेखाटी का माळ और नाळ
old well in shekhawati
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Highlights

सर्दियों में इन क्यारों में खड़े पाणत्या की स्थिति क्या होती होगी और गर्मियों में कील्या की दशा की कल्पना सहज संभव नहीं। बार्यो देना तो सबसे कठिन। किंतु इसका बदला बारह मास हरे-भरे लहलहाते खेतों और अन्न से भरे कोठों के रूप में मिलता था। अन्न से भरे बैलगाड़े तीन चार महीनों तक दिन रात अनवरत गांवों से शहरों की ओर चलते तब भी किसान का कोठा खाली न रहता।

शेखाटी जल, जमीन और जीवटता के लिए जनविश्रुत है। इसी पुण्यप्रताप से यह भूमि सदैव आत्मनिर्भर रही जिसमें सर्वाधिक योग जल का रहा। यद्यपि यहां सदावहिनी नदियों का बाहुल्य वागड़-हाड़ौती-माळवे-सा न रहा किंतु यहां की जमीं जल से गळगच रही।

यहां के बीड़ों में चरकर पश्चिमी राजस्थान के ऊंटों के टोळे और भेड़-बकरियों के रेवड़ कई वर्षों तक पुष्ट हुए हैं। रायका-रेबारियों के 'खोज' यहां से कभी मिटते न थे।

आज रेगिस्तान ने पांव पसारकर चाहे इसके कई इलाकों को 'डार्क जोन' घोषित करवा दिया हो किंतु आज से चालीस-पचास वर्ष पूर्व तक यहां के छोटे-छोटे गांवों में भी सैंकड़ों लावें (कुएं) चलती थी। कहावत चली- 'शेखाटी का माळ में मोकळा नाळ।'

कुएं यहां के बाशिंदों की समृद्धि और वैभव का आधारस्तंभ थे। शायद इसीलिए यहां मवेशियों को 'धन' और कुओं को 'कोठी' कहा जाता है। कोठियों ने जल के साथ-साथ जामणजायों को भी जोड़ कर रखा।

संयुक्त परिवारों को सहेजने में पानी ने खूब योग दिया। पाणी था तो पैठ थी, पैठ थी तो परिवार था, पाणी गया तो परिवारों पर भी पाट फिर गया।

पानी यूं ही साझी संपत्ति नहीं कहलाता। इसे भोगने के लिए कुटुंब जोड़ने पड़ते हैं। कोठी पूरे गांव को ही कुटुंब में जोड़ती है। कोठी जिसमें बारी से लेकर बामण, बैल से लेकर बबूल सबका सहयोग अपेक्षित होता।

कोठी जिसकी कहानी 'टांचे' से शुरू होकर 'चूए' पर खत्म होती। टांचा देने से पहले बालाजी और चूआ आने के बाद बालाजी यानि पुरुषार्थ और देव-कृपा अनिवार्य।

कोठी खुदवाने वाले परिवार का मुखिया जल संभावित भूमि पर चार जगह ढिगली (रेत की छोटी ढेरी) बनाता। चारों ढिगलियों पर नारियल घुमाकर बालाजी के थान पर पहुंचाया जाता और

'सुगनी' सुगन लेता- 'फलां ढिगली के नीचे पानी मिलेगा।' भूमि पूजन कर खनन का आरंभ 'टांचा' कहलाता है।

पांच-सात हाथ तो कोई भी खोद ले किंतु आगे का उत्तरदायित्व कुशल खनिकों को लेना होता। इंच दर इंच जमीन की परख और सावधानी। विज्ञान और साधन संपन्न व्यक्ति भले ही अपने

पार्टनर की प्रकृति भी न समझ पाता हो,ये खनिक अपने आस पास की जमीन की प्रकृति भलीभांति समझते थे।

खंदक खुदे पर धंसे नहीं इसके लिए कूंचों (सरकंडों) से 'बाते' बनाए जाते। बातों के घेरे से धंसने लायक मिट्टी को स्थिर कर आगे की खुदाई की जाती। खुदी हुई मिट्टी को बाहर निकालना भी तो आसान नहीं।

जहां तक मानव सामर्थ्य काम करता, चोल्या ( बंवळी नामक वृक्ष की मुलायम किंतु मजबूत टहनियों को चीरकर बुनी गई टोकरी) भर-भरकर मिट्टी बाहर फेंक देता। मानवी हाथ खड़े होते ही बैलों की जोड़ी आ खड़ी होती।

आज जिस तरह घर में गाड़ी होना स्टेटस सिंबल है वैसे ही उस जमाने में मजबूत बैलों का घर में होना प्रतिष्ठा का विषय हुआ करता था। हमारे दा'जी की खेर्या और लाखट्या की जोड़ी आस पास में प्रसिद्ध थी।

अब बैल आए तो 'ढाणां' बना। चलिए ढाणां जान लीजिए- मजबूत वृक्ष का तना काटकर खुदे हुए घेरे के किनारे रखा जाता जो 'चाट' कहलाती। उसी पर दो खड़े मुसळ्ये (डांड ) लगाकर आड़ी लकड़ी की 'पाट' बनती जिस पर 'भूण' लगाई जाती।

भूण निर्माण एरा-गेरा नहीं, कुशल खाती ही कर पाता। अंदर ही अंदर लकड़ी की कीलियां लगाकर लकड़ी के कई टुकड़ों को गोलाकार जोड़ना पर्याप्त अभ्यास, कुशलता और श्रम साध्य कार्य था। लकड़ी की भूण को ग्रीस करने के लिए घी से 'वांगा' (ग्रीस करना) जाता।

इधर ढाणा बन रहा है तो उधर लाव (कुएं से मिट्टी, पानी खींचने का मोटा रस्सा) बंटी ‌जा रही है। लाव बंटना भी अव्वल दर्जे की कारीगरी। दो-चार गांवों में कोई एक विशेषज्ञ और दो-चार इंटर्न।

लाव-बंटाई के लिए जूट के भारे खरीदे जाते। रेशों को भरपूर बल के साथ मरोड़ी दे-देकर दो सौ, तीन सौ हाथ की लंबाई तक गूंथा जाता। इसे पुनः दो लड़ा फिर तीन लड़ा गूंथा जाता। अब यह

लाव पर्वत उखाड़ सकती है। समुद्र मंथन के समय शेखाटी की लाव गुंथेरो से संपर्क कर लिया जाता तो बेचारे शेषनाग की शामत न आती।

लाव से बैल जोड़े जाते, और कोवड़ी से मिट्टी निकाली जाती। घूण बैलों से चलती और लापरिये (ब्रेक) से रुकती। अमूमन पचास से साठ हाथ पर चुआ (पानी) निकल आता।
यहां प्रकृति की सहायता पूरी हुई और मानवीय शिल्प प्रारंभ।

चतुर चेजारे 'नाळ गाळने' कुएं में प्रविष्ट हुए। जितने हाथ नाळ गळे उतने हाथ पानी। बैलों को सर्वाधिक श्रम इसी दौरान करना पड़ता। सहराती (दिन रात) लाव खींचने के लिए दो-दो जोड़ी ( बैल) चलती, तब कहीं पानी टूटता। श्रम बढ़ता तो लोग जुड़ते। बिना खर्च के युद्धस्तर का श्रम।

यही समय था 'ल्हास' का। गांवों में बड़े-बड़े श्रमसाध्य कार्य ल्हास के सहारे ही संपन्न होते। एक आयोजन जो सहकार की भावना से आयोजित होता। बिना किसी वित्तीय लेनदेन के लोग दूर दराज से बड़ी संख्या में किसी परिवार की मदद करने आते और ल्हास आयोजक श्रमदाता के परिवार तक को खुले दिल से जिमाता।

पकवान सबसे बड़ा पारिश्रमिक बना। लोग खूब पचते और भरपेट खीर-चूरमा, दाल-चूरमा या हलवा-पूड़ी खाते।

जब नाळ पूरी तरह बैठ जाती तो कुएं की 'चिणाई' की जाती। अब बाहर भीतर निर्माण ही निर्माण। जितना गहरा कुआं उतनी ही लंबी 'घूण' बाहर बनेगी। ऊपर 'ढाणा' नीचे 'बीढा'। अब कुआं कोठी बन चुका है अर्थात् अमृत जैसा मीठा पानी देने को तैयार। पर पानी लेने के लिए पात्र तो चाहिए।

मिनख की प्यास तो घड़ा या बाल्टी बुझा सकते है पर धन-ढांढों और जाव (खेत) को तर करने के लिए तो 'चड़स' ही काम करेगा। भैंस के मोटे चमड़े को गोलाकार पात्र की शक्ल देने के लिए मांडळ बनाकर बाधी ( चमड़े की डोरी) से नाकी (गूंथना) जाती है। किनारे पर कोचे (बड़े छेद) रखे जाते ताकि पानी आसानी से ढोळा जा सके।

चड़स संभालने वाला 'चड़स्या' चड़स को पानी में ठीक से डुबोने के लिए पैर की ठोकर या मरोड़ देता है और गीत गाता जाता । इस समय वह 'बार्यो' कहलाता है और उसका संगीत 'बार्यो देना'। बार्या और कील्या (कीली देने वाला) के मध्य गजब का सामंजस्य। दोनों की बात को पलमों में समझता है क्यारी वाला 'पाणत्या'। बार्या लगा कि कीली खुली, कीली खुली कि क्यारा भरा। बच्चे

अपने से दुगुनी लकड़ी की डांग को हथेली पर स्थिर करने के लिए गाते हैं-
झुक झुक लकड़ी झुक झुक तारा
भ्याइजी की भैंस पटेल जी का नारा
खोल दे कीली भर दे क्यारा

सर्दियों में इन क्यारों में खड़े पाणत्या की स्थिति क्या होती होगी और गर्मियों में कील्या की दशा की कल्पना सहज संभव नहीं। बार्यो देना तो सबसे कठिन। किंतु इसका बदला बारह मास हरे-भरे लहलहाते खेतों और अन्न से भरे कोठों के रूप में मिलता था। अन्न से भरे बैलगाड़े तीन चार महीनों तक दिन रात अनवरत गांवों से शहरों की ओर चलते तब भी किसान का कोठा खाली न रहता।

पानी 'सांवटा' था पर सुलभ नहीं। बिना मेहनत के बेकद्री होती है,पानी भी उसी बेकद्री का शिकार हुआ।

पानी तो इतना कि बैल की जोड़ियां निकाल-निकालकर थक जाती पर पानी स्तर न छोड़ता। चौमासे का जलस्तर इतना ऊंचा कि जेवड़ी (छोटी सी रस्सी) से बाल्टी बांधकर निकाल लो। फिर अचानक यह जल गया कहां। तीस-चालीस वर्षों में अकूत जल राशि सूख गई।

बुजुर्ग कहते हैं- जल को बिजली खा गई। कहते हैं अंग्रेजों के जमाने में बिजली आई तो उन्होंने खेतों में बिजली इस तर्क के साथ देने से मना किया कि बिजली से पानी निकाला तो जमीन खोखली हो जायेगी। बुजुर्गों की बातों में कितनी सचाई है यह वर्तमान स्थिति बयां कर रही है।

अमेरिकी एजेंसी नासा शेखावाटी के गिरते जल स्तर को लेकर चेता चुकी है। बताया गया कि प्रदेश के चूरू, झुंझुनूं और सीकर जिलों का जलस्तर देश ही नहीं, बल्कि दुनिया में सबसे तेज गति से गिर रहा है।

कभी बाग-बगीचों के कारण बागड़ कहलाने वाली शेखाटी आज बंजर होती जा रही है।

- नीलू शेखावत

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