मनोज शर्मा
शिवगंज | नगरपालिका में किसका बोर्ड बनेगा, इसका फैसला अब कुछ ही घंटों में होने वाला है। मतदान से पहले शहर की राजनीति में जितनी बेचैनी दिखाई दे रही है, उतनी शायद चुनाव परिणाम आने के बाद भी नहीं थी। 18 सीटों के साथ स्पष्ट बढ़त हासिल करने वाली भाजपा के सामने बोर्ड बनाने की चुनौती संख्या जुटाने से अधिक अपने संख्या बल को मतदान तक पूरी तरह एकजुट रखने की है।
कांग्रेस 14 सीटों के साथ बहुमत से दूर है, लेकिन पूर्व विधायक संयम लोढ़ा की सक्रियता और राजेश सोनी की अध्यक्ष पद पर दावेदारी ने मुकाबले को रोचक बना दिया है। पर्दे के पीछे जारी बैठकों और राजनीतिक संपर्कों के कारण यह कहना मुश्किल हो गया है कि मतदान के समय ऊंट किस करवट बैठेगा।
संख्या बल भाजपा के साथ, फिर भी बेचैनी क्यों?
नगरपालिका चुनाव में भाजपा ने 18, कांग्रेस ने 14 और निर्दलीय प्रत्याशियों ने तीन सीटों पर जीत दर्ज की। इसके बाद एक निर्दलीय पार्षद के भाजपा खेमे में आने के दावे से भाजपा समर्थित पार्षदों की संख्या 19 तक पहुंच गई।
कागज पर यह आंकड़ा भाजपा को मजबूत स्थिति में खड़ा करता है। इसके बावजूद पार्टी ने अपने पार्षदों की कड़ी बाड़ेबंदी कर रखी है। पिछले राजनीतिक अनुभवों और संभावित क्रॉस वोटिंग की आशंका को देखते हुए भाजपा मतदान तक किसी भी प्रकार का जोखिम नहीं लेना चाहती।
भाजपा के सामने वास्तविक चुनौती बहुमत जुटाने की नहीं, बल्कि उपलब्ध संख्या बल को अंतिम मतदान तक पूरी तरह सुरक्षित रखने की है। यही कारण है कि मजबूत स्थिति में होने के बावजूद पार्टी नेतृत्व लगातार पार्षदों और स्थानीय नेताओं के संपर्क में है।
अध्यक्ष प्रत्याशी के चयन से बिगड़ा आंतरिक संतुलन
शिवगंज की राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ भाजपा के अध्यक्ष पद के प्रत्याशी के चयन के बाद आया। शहर में लंबे समय से चर्चा थी कि पार्टी दिनेश बिंदल को नगरपालिका अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बना सकती है।
भाजपा ने अंतिम समय में कुंदनमल अग्रवाल को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। अग्रवाल का नामांकन दाखिल होने के बाद दिनेश बिंदल का पार्टी कैंप से बाहर निकलकर घर पहुंचना भाजपा के लिए अचानक उत्पन्न हुआ संकट बन गया।
बिंदल की नाराजगी ने पार्टी के भीतर चल रहे स्थानीय राजनीतिक समीकरणों और नेतृत्व के साथ उनके मतभेदों को सार्वजनिक कर दिया। इसके बाद भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें मनाने और पार्टी के साथ बनाए रखने के प्रयास शुरू किए।
सबसे पहले सांसद लुंबाराम चौधरी पहुंचे
दिनेश बिंदल के कैंप से बाहर निकलने के बाद उन्हें मनाने की कवायद में सबसे पहले सांसद लुंबाराम चौधरी को लगाया गया। सांसद ने बिंदल से बातचीत कर उनसे पार्टी के साथ बने रहने और अध्यक्ष चुनाव में भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करने का आग्रह किया।
बताया जा रहा है कि बातचीत के दौरान बिंदल ने स्वयं को पार्टी से अलग नहीं बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे भाजपा से जुड़े हुए हैं और पार्टी के पक्ष में ही मतदान करेंगे। हालांकि कैंप में वापस लौटने को लेकर उन्होंने अपनी नाराजगी बरकरार रखी।
प्रदेश पदाधिकारियों ने फोन पर की बातचीत
बिंदल को मनाने के प्रयास केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहे। प्रदेश स्तर के पदाधिकारियों ने भी उनसे कई बार फोन पर बातचीत की। बिंदल ने इन चर्चाओं में पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा स्पष्ट की, लेकिन स्थानीय नेतृत्व के स्तर पर हुई कथित उपेक्षा को लेकर नाराजगी भी व्यक्त की।
यही स्थिति भाजपा नेतृत्व के लिए चिंता का कारण बनी रही। मामला केवल एक पार्षद की अध्यक्ष पद की दावेदारी तक सीमित नहीं था, बल्कि स्थानीय संगठन, प्रत्याशी चयन और नेतृत्व के साथ समन्वय से भी जुड़ा था।
मुख्यमंत्री कार्यालय से बातचीत के बाद नरम पड़ा रुख
दो दिनों तक चली बातचीत के बीच शुक्रवार को मुख्यमंत्री कार्यालय से संपर्क होने के बाद दिनेश बिंदल के रुख में नरमी दिखाई दी। इसके बाद उन्होंने सार्वजनिक बयान जारी कर स्वयं को भाजपा का कट्टर कार्यकर्ता बताया।
बिंदल ने कहा कि वे भाजपा में रहकर जनता की सेवा करते रहेंगे। उनके इस बयान से पार्टी को बड़ी राहत मिली। हालांकि वे पार्टी कैंप में वापस लौटने के लिए तैयार नहीं हुए, इसलिए उनके अंतिम राजनीतिक रुख को लेकर चल रही चर्चाएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं।
राज्यमंत्री ओटाराम देवासी ने की लंबी चर्चा
इसके बाद राज्यमंत्री ओटाराम देवासी स्वयं शिवगंज पहुंचे और दिनेश बिंदल से लंबी बातचीत की। भाजपा के लिए इस मुलाकात को बेहद महत्वपूर्ण माना गया। चर्चा के बाद बिंदल ने क्रॉस वोटिंग की किसी भी संभावना से स्पष्ट इनकार किया।
उन्होंने कहा कि वे 21 सितंबर को केरलेश्वर महादेव मंदिर में पूजा-अर्चना करने के बाद अपने समर्थकों के साथ मतदान केंद्र पहुंचेंगे और भाजपा के पक्ष में मतदान करेंगे।
इस बयान के बाद भाजपा खेमे ने राहत की सांस ली है। इसके बावजूद पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम ने स्पष्ट कर दिया कि मतदान तक प्रत्येक पार्षद के साथ संवाद और राजनीतिक समन्वय बनाए रखना पार्टी के लिए अत्यंत आवश्यक है।
14 सीटों के बावजूद कांग्रेस ने क्यों बढ़ाई हलचल?
कांग्रेस के पास 14 पार्षद हैं और वह बहुमत के आंकड़े से दूर है। इसके बावजूद पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने बोर्ड बनाने के प्रयासों को जिस तरह आगे बढ़ाया, उसने भाजपा की सतर्कता बढ़ा दी है।
कांग्रेस की ओर से राजेश सोनी को अध्यक्ष पद के लिए मैदान में उतारना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। सोनी वार्ड संख्या 35 में भाजपा के राजेंद्र सोलंकी से पार्षद का चुनाव हार चुके हैं, लेकिन अध्यक्ष पद के लिए उनके नामांकन ने पूरे राजनीतिक समीकरण को नया आयाम दे दिया है।
लोढ़ा की सक्रियता से भाजपा सतर्क
कांग्रेस के इस राजनीतिक प्रयास को भाजपा ने गंभीरता से लिया है। इसके बाद पार्षदों की बाड़ेबंदी और निगरानी अधिक कड़ी कर दी गई। भाजपा की रणनीति अपने सभी पार्षदों को एकजुट रखते हुए किसी भी संभावित क्रॉस वोटिंग को रोकने की है।
दूसरी ओर हॉर्स ट्रेडिंग को लेकर लगाए जा रहे कयासों को संयम लोढ़ा सार्वजनिक रूप से खारिज कर चुके हैं। उनका कहना है कि कांग्रेस विपक्ष में है और उसका राजनीतिक प्रयास भाजपा का बोर्ड बनने से रोकना है।
लोढ़ा की सक्रियता के कारण अब यह मुकाबला केवल संख्या बल का खेल नहीं रह गया है। यह दोनों दलों की रणनीति, राजनीतिक प्रबंधन और अंतिम क्षण तक अपने समर्थक पार्षदों को साथ रखने की क्षमता की परीक्षा बन गया है।
कागज पर बहुमत, मतदान तक असली परीक्षा
भाजपा के पास संख्या बल, संगठन और एक निर्दलीय के समर्थन का दावा है। दूसरी ओर कांग्रेस के पास अपेक्षाकृत कम संख्या है, लेकिन वह भाजपा की आंतरिक नाराजगी और संभावित क्रॉस वोटिंग की उम्मीद के सहारे मुकाबले में बनी हुई है।
दिनेश बिंदल ने भाजपा के पक्ष में मतदान करने की बात कहकर पार्टी नेतृत्व को राहत दी है, लेकिन अध्यक्ष चुनाव में गुप्त मतदान और अंतिम क्षण तक बदलते राजनीतिक समीकरणों के कारण भाजपा अभी भी पूरी तरह निश्चिंत नहीं है।
पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि उसके सभी पार्षद और समर्थक निर्दलीय मतदान के समय अधिकृत प्रत्याशी कुंदनमल अग्रवाल के साथ खड़े रहें। वहीं कांग्रेस को किसी राजनीतिक उलटफेर के लिए भाजपा खेमे में सेंध लगाने के साथ निर्दलीय पार्षदों का समर्थन भी जुटाना होगा।
21 सितंबर को खुलेगा सियासी पिटारा
शिवगंज नगरपालिका अध्यक्ष पद के लिए मतदान 21 सितंबर को होगा। इसी दिन स्पष्ट होगा कि भाजपा अपना संख्या बल सुरक्षित रखते हुए बोर्ड बना पाती है या कांग्रेस पर्दे के पीछे चल रही राजनीतिक रणनीति के जरिए कोई अप्रत्याशित उलटफेर करती है।
फिलहाल भाजपा मजबूत है, लेकिन बीते दिनों के घटनाक्रम ने मुकाबले को साधारण चुनाव से बदलकर राजनीतिक प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया है। मतदान तक नजर हटी तो पूरा खेल बदल सकता है।