मनोज शर्मा
शिवगंज। नगर पालिका में भाजपा का बोर्ड बने एक माह से अधिक का समय गुजर चुका है। सत्ता की कमान भी संभल गई और पालिकाध्यक्ष की कुर्सी पर भी ताजपोशी हो गई, लेकिन अब असली परीक्षा शुरू हुई है विकास के मोर्चे पर। चुनाव के दौरान जनता से किए गए वादे अब पार्षदों के सामने सवाल बनकर खड़े होने लगे हैं। वार्डों में काम करवाने की मांग तेज है, पार्षद पालिकाध्यक्ष के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन विकास की रफ्तार उम्मीदों से काफी पीछे नजर आ रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह नगर पालिका की कमजोर आर्थिक स्थिति बताई जा रही है। सूत्रों के अनुसार पालिका की आर्थिक हालत खराब है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब पालिका का खजाना ही खाली है तो चुनावी वादों की कीमत कौन चुकाएगा?
हैरानी की बात यह है कि भाजपा का बोर्ड बने एक माह से अधिक हो गया, लेकिन अभी तक पार्षद दल की एक औपचारिक बैठक तक नहीं हो पाई है। जिस बोर्ड से शहर को विकास की नई दिशा मिलने की उम्मीद थी, वहां अभी विकास की प्राथमिकताएं तय करने और पार्षदों के साथ सामूहिक रणनीति बनाने की प्रक्रिया ही शुरू नहीं हो पाई है। दूसरी तरफ वार्डों के पार्षदों पर जनता का दबाव लगातार बढ़ रहा है। चुनाव के समय लोगों ने जिन उम्मीदों के साथ उन्हें जिताया, अब उन्हीं उम्मीदों का हिसाब मांगना भी शुरू कर दिया है।
चाय के बहाने सियासी मंथन!
इन्हीं परिस्थितियों के बीच रविवार को पालिकाध्यक्ष कुंदनमल अग्रवाल ने अपनी होटल कुंदन जवाई पर भाजपा पार्षदों को चाय पर चर्चा के लिए आमंत्रित किया। इसे महज एक सामान्य मेल-मिलाप का कार्यक्रम मानना मुश्किल है। इसके पीछे पालिका की आर्थिक तंगहाली, विकास कार्यों का दबाव और पार्षदों की बढ़ती अपेक्षाओं की पूरी कहानी छिपी नजर आती है। जानकारी के अनुसार कुछ पार्षदों को छोड़कर अधिकांश भाजपा पार्षद इस गेट-टु-गेदर में शामिल हुए।
हालांकि इस चाय पार्टी में पार्षद दिनेश बिंदल को आमंत्रित किए जाने को लेकर भी अंदरखाने कानाफूसी की चर्चा रही। संपर्क करने पर बिंदल ने कहा कि उन्हें न तो इस आयोजन की कोई जानकारी है और न ही कोई आमंत्रण मिला। पालिका के बजट को लेकर उन्होंने जरूर बेबाकी से अपनी बात रखी। उनका कहना था कि बजट कोई बड़ा विषय नहीं है। हमारा बोर्ड सक्षम है। प्रदेश और केंद्र दोनों जगह भाजपा की सरकार है, ऐसे में विकास के लिए धन की कमी नहीं रहेगी। भाजपा बोर्ड जनता की आकांक्षाओं पर खरा उतरेगा।
पालिका में घाटा और विकास की बड़ी-बड़ी उम्मीदें!
चाय पर चर्चा के दौरान पालिकाध्यक्ष ने पार्षदों के सामने पालिका की निजी आय बढ़ाने और विकास कार्यों के लिए अतिरिक्त धनराशि जुटाने का मुद्दा रखा। पार्षदों से सुझाव मांगे गए कि आखिर पालिका के आय के स्रोत कैसे बढ़ाए जाएं और फंड की व्यवस्था किस तरह हो। सभी ने अपनी-अपनी राय रखी, लेकिन जानकारी के अनुसार कोई ऐसा ठोस और व्यावहारिक रास्ता सामने नहीं आया, जिससे पालिका की आर्थिक मुश्किलों का तत्काल समाधान निकलता दिखाई दे।
यहीं से भाजपा बोर्ड की असली चुनौती शुरू होती है। पालिका की आर्थिक हालत वाकई खराब है तो केवल सरकारी योजनाओं और अनुदान के भरोसे शहर की सभी अपेक्षाओं को पूरा करना आसान नहीं होगा। पालिका की अपनी आय बढ़ाने, राजस्व वसूली में सुधार करने और उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग की ठोस कार्ययोजना बनानी होगी। अन्यथा विकास की मांग और आर्थिक मजबूरी के बीच खाई लगातार चौड़ी होती जाएगी।
चुनाव में वादे सभी ने किए, अब जवाब देने की बारी!
चर्चा के दौरान पार्षदों ने भी अपनी पीड़ा जाहिर की। उनका कहना था कि चुनाव के दौरान जनता से किए गए वादों के अनुरूप अभी तक वार्डों में अपेक्षित विकास कार्य नहीं हो पाए हैं। कुछ चुनिंदा पार्षदों के वार्डों को छोड़ दें तो अन्य वार्डों में कोई बड़ा काम नजर नहीं आ रहा है। ऐसे में पार्षदों के सामने अपने ही मतदाताओं को जवाब देने की स्थिति बन रही है।
सवाल यह भी है कि क्या विकास कार्यों की प्राथमिकताएं वार्डों की जरूरत के आधार पर तय होंगी या फिर पार्षदों को अपनी मांग मनवाने के लिए इंतजार करना पड़ेगा? बोर्ड में शामिल हर पार्षद को अपने वार्ड के विकास की उम्मीद है, लेकिन पालिका की आर्थिक स्थिति को देखते हुए सभी मांगों को एक साथ पूरा करना संभव नहीं दिखता। ऐसे में पारदर्शी प्राथमिकता और समान विकास की नीति बनाना भी पालिकाध्यक्ष के लिए बड़ी चुनौती होगी।
दीपावली सिर पर, शहर की सजावट के लिए भी चाहिए बजट
इधर दीपावली का त्योहार भी नजदीक है। शहर में रोशनी, सजावट, सफाई और अन्य व्यवस्थाओं पर खर्च होना तय है। एक तरफ त्योहार की तैयारियां हैं तो दूसरी तरफ वार्डों में विकास कार्यों की लंबित मांगें। ऐसे में पालिका के सीमित संसाधनों का प्रबंधन करना आसान नहीं होगा। इधर पालिका को अपने नियमित खर्चे भी देखने हैं।
हालांकि पालिकाध्यक्ष कुंदनमल अग्रवाल ने पार्षदों को भरोसा दिलाया कि विकास कार्यों के लिए धन जुटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। इसके लिए हरसंभव प्रयास किए जाएंगे।
अब चाय की चुस्कियों से नहीं, काम की रफ्तार से बनेगी पहचान
दरअसल, शिवगंज के भाजपा बोर्ड के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। पहली, पालिका की आर्थिक स्थिति को सुधारना और दूसरी, चुनाव के दौरान जनता से किए गए वादों को पूरा करना। इसके साथ ही पार्षदों के बीच समन्वय स्थापित करना और बोर्ड की सामूहिक कार्यशैली को मजबूत करना भी जरूरी है। एक माह से अधिक समय बीतने के बावजूद औपचारिक पार्षद बैठक नहीं होना भी कई सवाल खड़े करता है।
शहर की जनता को इस बात से कोई खास फर्क नहीं पड़ता कि पार्षदों की बैठक होटल में होती है या पालिका सभागार में। जनता को तो अपने मोहल्ले की टूटी सड़कें, जाम नालियां, पेयजल की समस्या, अंधेरी गलियां और सफाई की बदहाल व्यवस्था ठीक होती दिखाई देनी चाहिए।
अब पालिकाध्यक्ष को तय करना होगा कि बोर्ड की प्राथमिकता केवल पार्षदों को साथ लेकर चलना है या पूरे शहर को विकास की पटरी पर लाना भी है। भाजपा के पास प्रदेश और केंद्र दोनों जगह अपनी सरकार होने का राजनीतिक लाभ जरूर है, लेकिन उस लाभ को शिवगंज के विकास में बदलना ही असली कसौटी होगी।
क्योंकि जनता ने भाजपा को चाय पर चर्चा करने के लिए नहीं, शहर की तस्वीर बदलने के लिए जनादेश दिया है। अब सवाल यह नहीं कि चाय पर क्या चर्चा हुई, सवाल यह है कि उस चर्चा के बाद शहर को क्या मिला?