राजस्थान

खेती में क्रांति: नया रोडमैप तैयार: शिवराज सिंह चौहान का बड़ा ऐलान: हर राज्य का होगा अलग कृषि रोडमैप, फार्मर आईडी से मिलेगी खाद और मुआवजा

जोगेन्द्र सिंह शेखावत · 08 अप्रैल 2026, 12:05 दोपहर
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जयपुर में रीजनल कृषि कॉन्फ्रेंस के दौरान खेती में बड़े सुधारों की घोषणा की। अब देश को 5 एग्रो-क्लाइमेटिक ज़ोन में बाँटकर हर राज्य के लिए अलग रणनीति बनाई जाएगी और फार्मर आईडी के जरिए भ्रष्टाचार मुक्त खाद-बीज वितरण सुनिश्चित होगा।

जयपुर | केंद्र सरकार ने भारतीय कृषि के परिदृश्य को पूरी तरह बदलने के लिए एक व्यापक और दूरदर्शी योजना पेश की है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्पष्ट किया है कि अब दिल्ली में बैठकर पूरे देश के लिए एक जैसी योजना नहीं बनेगी।

जयपुर में आयोजित पहली रीजनल कृषि कॉन्फ्रेंस में उन्होंने घोषणा की कि अब देश को पांच अलग-अलग एग्रो-क्लाइमेटिक जोनों में विभाजित किया जाएगा। इस विभाजन का उद्देश्य हर क्षेत्र की विशिष्ट आवश्यकताओं को समझना और उसी के अनुरूप नीतियां बनाना है।

क्षेत्रीय चुनौतियों का क्षेत्रीय समाधान

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि पहले रबी और खरीफ की फसलों के लिए केवल एक राष्ट्रीय स्तर की कॉन्फ्रेंस होती थी। उस समय की कमी के कारण राज्यों की स्थानीय समस्याओं पर विस्तार से चर्चा नहीं हो पाती थी।

अब पांच रीजनल कॉन्फ्रेंस के माध्यम से हर राज्य की जलवायु, मिट्टी की प्रकृति और पानी की उपलब्धता पर ध्यान दिया जाएगा। विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों की मदद से यह तय होगा कि किस जिले में कौन सी फसल सबसे अधिक मुनाफा देगी।

यह नया कृषि रोडमैप न केवल उत्पादन बढ़ाएगा बल्कि संसाधनों के अपव्यय को भी रोकेगा। राजस्थान की मरुस्थलीय भूमि से लेकर मध्य प्रदेश के उपजाऊ मैदानों तक, हर जगह के लिए अलग रणनीति होगी।

फार्मर आईडी: पारदर्शिता का नया युग

किसानों के लिए सबसे बड़ी खबर यह है कि अब अगले तीन महीनों के भीतर पूरे देश में फार्मर आईडी बनाने का काम पूरा कर लिया जाएगा। यह आईडी किसानों के लिए आधार कार्ड की तरह ही क्रांतिकारी साबित होने वाली है।

इस डिजिटल पहचान के माध्यम से खाद, बीज, फसल बीमा और मुआवजे का वितरण सीधे और सटीक होगा। मध्य प्रदेश में सफल रहे खाद वितरण मॉडल को अब पूरे देश में लागू करने की तैयारी है।

अक्सर किसानों को खाद के लिए लंबी लाइनों में लगना पड़ता है, लेकिन अब उनकी जमीन और फसल के आधार पर खाद की मात्रा पहले से तय होगी। इससे कालाबाजारी और नकली खाद की समस्या पर लगाम लगेगी।

बटाईदार किसानों को भी मिलेगा हक

मंत्री जी ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण घोषणा बटाईदार या टेनेंट किसानों के लिए की है। अब तक सरकारी योजनाओं का लाभ केवल जमीन के मालिक को ही मिलता था, जिससे वास्तविक खेती करने वाले वंचित रह जाते थे।

अब फार्मर आईडी में जमीन मालिक की सहमति के आधार पर बटाईदार किसानों का नाम भी जुड़ सकेगा। इससे उन्हें भी खाद, बीज और फसल क्षति का मुआवजा सीधे उनके बैंक खातों में मिल सकेगा।

यह कदम कृषि क्षेत्र में सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा। इससे उन लाखों परिवारों को सुरक्षा मिलेगी जो दूसरों की जमीन पर मेहनत कर देश का पेट भरते हैं।

तिलहन में आत्मनिर्भरता: 10 हजार करोड़ का निवेश

खाद्य तेलों के आयात पर भारत की निर्भरता कम करने के लिए सरकार ने 'राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-तिलहन' को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का संकल्प लिया है। इसके लिए 10,103 करोड़ रुपये का भारी-भरकम प्रावधान किया गया है।

वर्ष 2024-25 में तिलहन का उत्पादन रिकॉर्ड 429.89 लाख टन तक पहुंच गया है। सरकार का अगला लक्ष्य तिलहन के क्षेत्र को 29 मिलियन हेक्टेयर से बढ़ाकर 33 मिलियन हेक्टेयर तक ले जाना है।

उत्पादकता में भी भारी वृद्धि का लक्ष्य रखा गया है। इसे 1353 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़ाकर 2112 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर किया जाएगा, ताकि कुल उत्पादन 69.7 मिलियन मैट्रिक टन तक पहुंच सके।

वैल्यू चेन और इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर

केवल उत्पादन बढ़ाना ही काफी नहीं है, बल्कि किसानों को उनकी उपज का सही दाम दिलाना भी जरूरी है। इसके लिए सरकार 1076 वैल्यू चेन क्लस्टर विकसित कर रही है।

देश भर में 60 बीज केंद्र और 50 बीज भंडारण इकाइयां स्थापित की जा रही हैं। इसके अलावा, तिलहन की प्रोसेसिंग के लिए 800 तेल मिलें लगाने का लक्ष्य है, जिनमें से 400 मिलें पहले ही काम करना शुरू कर चुकी हैं।

यह बुनियादी ढांचा किसानों को बिचौलियों के चंगुल से बचाएगा और उन्हें सीधे बाजार से जोड़ेगा। जब गांव में ही प्रोसेसिंग यूनिट होगी, तो किसानों की परिवहन लागत भी कम होगी और मुनाफा बढ़ेगा।

दलहन मिशन: दालों में मजबूती की ओर कदम

दालों के मामले में भी भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए 'दलहन मिशन' पर तेजी से काम हो रहा है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह किसानों से अरहर, उड़द और मसूर जैसी दालों की 100 प्रतिशत खरीद करेगी।

बीज उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए किसानों को प्रति क्विंटल बड़ी आर्थिक सहायता दी जा रही है। तुअर के लिए 4500 रुपये, तुअर-उड़द के लिए 2000 रुपये और चना के लिए 1800 रुपये प्रति क्विंटल की मदद दी जाएगी।

राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों को बीज वितरण के लिए विशेष लक्ष्य दिए गए हैं। इन राज्यों में दालों की नई और उन्नत किस्मों को सीड चेन में शामिल किया जा रहा है ताकि पैदावार बढ़ सके।

दाल मिलों का नेटवर्क और मॉडल जिले

देश के कुल दाल उत्पादन का 60 प्रतिशत हिस्सा केवल चार राज्यों से आता है। इनमें मध्य प्रदेश का नर्मदापुरम, राजस्थान का झालावाड़ और गुजरात का जूनागढ़ जैसे जिलों को मॉडल के रूप में विकसित किया जाएगा।

प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने के लिए मध्य प्रदेश में 55, महाराष्ट्र में 34 और राजस्थान में 30 नई दाल मिलें स्थापित की जाएंगी। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।

सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए राज्यों को करोड़ों रुपये का बजट आवंटित किया है। राजस्थान को 312 करोड़ और मध्य प्रदेश को 344 करोड़ रुपये केवल दलहन मिशन के तहत दिए जाएंगे।

नकली खाद-बीज के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस'

किसानों के साथ धोखाधड़ी करने वाले नकली खाद और कीटनाशक विक्रेताओं के खिलाफ सरकार अब बेहद सख्त रुख अपनाने जा रही है। मंत्री जी ने बताया कि मौजूदा 1968 का कानून अब पुराना पड़ चुका है।

अगले संसद सत्र में सरकार एक नया और कड़ा कानून लाने की तैयारी में है। इसमें दोषियों के लिए कठोर कारावास और भारी जुर्माने का प्रावधान होगा, ताकि कोई भी किसानों के भविष्य के साथ खिलवाड़ न कर सके।

इसके साथ ही एक हाई-टेक ट्रैकिंग सिस्टम बनाया जा रहा है। इस सिस्टम के जरिए खाद के कारखाने से निकलने से लेकर किसान के हाथ में पहुंचने तक की पूरी प्रक्रिया पर डिजिटल नजर रखी जाएगी।

लैब टू लैंड: वैज्ञानिकों का सीधा जुड़ाव

विकसित कृषि संकल्प अभियान के तहत अब वैज्ञानिक केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहेंगे। देश के लगभग 16,000 कृषि वैज्ञानिक और विशेषज्ञ सीधे खेतों तक पहुंचेंगे।

ICAR संस्थान और कृषि विज्ञान केंद्र किसानों को 'लैब टू लैंड' सिद्धांत के आधार पर आधुनिक तकनीक सिखाएंगे। इससे किसानों को नई किस्मों और वैज्ञानिक खेती के तरीकों की जानकारी सीधे विशेषज्ञों से मिलेगी।

प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया को भी सरल बनाया जा रहा है। इससे किसानों को उनके रसायण मुक्त उत्पादों के लिए प्रीमियम बाजार में ऊंचे दाम मिल सकेंगे।

इंटीग्रेटेड फार्मिंग: आय बढ़ाने का मंत्र

छोटी जोत वाले किसानों की आय बढ़ाने के लिए सरकार इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल पर जोर दे रही है। इसमें केवल अनाज उगाना ही काफी नहीं है, बल्कि उसके साथ पशुपालन और अन्य गतिविधियां भी जरूरी हैं।

किसानों को अनाज के साथ फल, फूल, सब्जियां और औषधीय खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। साथ ही मधुमक्खी पालन, मछली पालन और बकरी पालन जैसे व्यवसायों को भी खेती से जोड़ा जाएगा।

एग्रो फॉरेस्ट्री यानी खेतों की मेड़ों पर पेड़ लगाने की पद्धति को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे न केवल पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, बल्कि किसानों को समय-समय पर अतिरिक्त आय भी होती रहेगी।

बाजार की अनिश्चितता और 'APT' सुरक्षा

आलू, प्याज और टमाटर (APT) जैसी फसलों के दाम गिरने पर किसानों को होने वाले नुकसान से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने एक नई सुरक्षा योजना बनाई है।

जब भी बाजार में इन फसलों की अधिकता होगी, राज्य सरकारें सीधे किसानों से खरीद करेंगी। इन फसलों को बड़े शहरों तक पहुंचाने का परिवहन और भंडारण का पूरा खर्च केंद्र सरकार वहन करेगी।

इससे किसानों को डिस्ट्रेस सेल यानी मजबूरी में कम दाम पर फसल बेचने से मुक्ति मिलेगी। उपभोक्ताओं को भी साल भर वाजिब दाम पर सब्जियां उपलब्ध हो सकेंगी।

आपदा प्रबंधन और आधुनिक तकनीक

प्राकृतिक आपदाओं के समय फसल क्षति का आकलन अब केवल पटवारियों के भरोसे नहीं रहेगा। सरकार सैटेलाइट आधारित रिमोट सेंसिंग तकनीक का उपयोग कर वैज्ञानिक तरीके से नुकसान का जायजा लेगी।

फार्मर आईडी के साथ इस तकनीक को जोड़कर मुआवजा वितरण की प्रक्रिया को इतना तेज किया जाएगा कि किसान को राहत के लिए महीनों इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे वैश्विक संकटों के बावजूद, प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सरकार ने सुनिश्चित किया है कि देश में खाद की कोई कमी न हो। वर्तमान में खरीफ और रबी दोनों फसलों के लिए पर्याप्त भंडार मौजूद है।

लचीली फंडिंग और राज्यों की स्वायत्तता

केंद्र सरकार ने राज्यों को योजनाओं के क्रियान्वयन में अधिक लचीलापन देने का निर्णय लिया है। अब राज्य अपनी जरूरत के हिसाब से बजट का उपयोग कर सकेंगे।

यदि किसी राज्य को ड्रिप सिंचाई की अधिक आवश्यकता है, तो वह उस मद में अधिक पैसा खर्च कर सकेगा। इसी तरह मैकेनाइजेशन या प्रोसेसिंग की जरूरत वाले राज्यों को वहां प्राथमिकता दी जाएगी।

यह सहकारी संघवाद का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां केंद्र और राज्य मिलकर किसान की बेहतरी के लिए काम करेंगे। जयपुर की यह कॉन्फ्रेंस इसी साझा संकल्प की एक मजबूत शुरुआत है।

सम्मेलन के अंत में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और अन्य राज्यों के मंत्रियों ने भी अपने विचार रखे। सभी ने एक स्वर में माना कि यदि किसान खुशहाल होगा, तभी भारत विकसित राष्ट्र बनने के अपने सपने को पूरा कर पाएगा।

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