रेवदर |अर्बुदारण्य की पावन धरा पर स्थित श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा की ओर से नंदगांव में आयोजित ‘श्री सुरभि हरिहर चातुर्मास आराधना महोत्सव’ श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है। इस महोत्सव में प्रतिदिन धर्माचार्य मण्डपम् स्थित सत्संग मण्डप में धर्मसभा का आयोजन किया जा रहा है, जो परम श्रद्धेय गोऋषि स्वामी श्री दत्तशरणानंदजी महाराजश्री की पावन प्रेरणा से हो रहा है।
गुरु की शरण में श्रीराम: एक दिव्य यात्रा
धर्मसभा में देशभर से आए गोभक्तों को संबोधित करते हुए जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री सदानन्द सरस्वतीजी महाराज, द्वारका-शारदापीठाधीश्वर ने एक महत्वपूर्ण प्रसंग का वर्णन किया।
उन्होंने बताया कि श्रीराम का जीवन केवल एक राजकुमार की कथा नहीं है, बल्कि यह धर्म, गुरु-परम्परा, ज्ञान, त्याग और लोकमंगल की एक दिव्य यात्रा का प्रतीक है।
विश्वामित्र की याचना और दशरथ का धर्मसंकट
जगद्गुरु ने कहा कि जब समाज में अधर्म का प्रभाव बढ़ने लगा और ऋषि-मुनियों के यज्ञ-अनुष्ठानों में विघ्न उत्पन्न होने लगे, तब महर्षि विश्वामित्र अयोध्या पहुंचे।
उन्होंने महाराज दशरथ से धर्म की रक्षा के लिए श्रीराम को अपने साथ वन ले जाने की याचना की। यह महाराज दशरथ के लिए एक अत्यंत कठिन क्षण था।
वे स्वयं अपनी सेना के साथ जाने को तैयार थे, लेकिन महर्षि विश्वामित्र का संकल्प था कि यह महान कार्य श्रीराम के माध्यम से ही पूर्ण होगा।
इस प्रसंग में गुरु वसिष्ठ की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने महाराज दशरथ को विश्वामित्र की महानता और उनके सामर्थ्य का स्मरण कराया।
गुरु वसिष्ठ ने समझाया कि महापुरुषों के कार्यों के पीछे एक व्यापक लोककल्याण की योजना छिपी होती है। अंततः, श्रीराम और लक्ष्मण, महर्षि विश्वामित्र के साथ वन की ओर प्रस्थान करते हैं।
सरयू तट पर मिली ‘बला-अतिबला’ की दिव्य विद्या
विश्वामित्र, श्रीराम और लक्ष्मण को सरयू नदी के दक्षिणी तट पर ले गए। वहां उन्होंने श्रीराम को ‘बला’ और ‘अतिबला’ जैसी दिव्य विद्याओं का उपदेश दिया।
जगद्गुरु ने इन विद्याओं के महत्व को समझाते हुए कहा कि ये केवल शारीरिक सामर्थ्य से जुड़ी नहीं थीं।
आंतरिक शक्ति का महत्व
ये विद्याएं साधक को संयम, स्थिरता और गहरी आंतरिक शक्ति प्रदान करने वाली थीं। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में वास्तविक शक्ति केवल बाहरी सामर्थ्य को नहीं माना गया है।
मनुष्य का भीतर से मजबूत होना अत्यंत आवश्यक है। जिसके पास संयम रूपी ‘बला’ और विवेक रूपी ‘अतिबला’ है, वही जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी स्थिर रह सकता है।
विश्वामित्र से मिथिला तक धर्मयात्रा
अपने गुरु के मार्गदर्शन में श्रीराम ने ऋषियों की रक्षा की और धर्मविरोधी शक्तियों का विनाश किया।
इसके बाद, यही दिव्य यात्रा उन्हें मिथिला की ओर ले गई। मिथिला न केवल राजा जनक की राजधानी थी, बल्कि ज्ञान, वैराग्य और अध्यात्म की भूमि भी थी।
आगे चलकर इसी पवित्र धरती पर भगवान शिव के धनुष और श्रीसीताराम के मंगलमय मिलन का प्रसंग सामने आता है।
श्रीराम और आदि शंकराचार्य के जीवन में समानता
जगद्गुरु ने कहा कि श्रीराम और आदि शंकराचार्य के जीवन में एक महत्वपूर्ण समानता दिखाई देती है।
दोनों का जीवन निजी वैभव या सुख के लिए नहीं, बल्कि धर्म की प्रतिष्ठा और लोकमंगल के लिए पूरी तरह समर्पित रहा।
श्रीराम ने गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से राजमहल का त्याग किया, वहीं आदि शंकराचार्य ने अल्पायु में ही भारत की आध्यात्मिक एकता और वेदान्त के प्रचार का महान दायित्व संभाला।
गुरु मार्गदर्शन का महत्व
उन्होंने कहा कि जब जीवन में विश्वामित्र जैसे महान गुरु का मार्गदर्शन प्राप्त हो, तो समर्थ व्यक्ति को भी विनयपूर्वक गुरु के पीछे चलना चाहिए।
गुरु पहले अपने साधक को शक्ति और ज्ञान प्रदान करता है और फिर उसे लोककल्याण के महान कार्यों के योग्य बनाता है।
श्रीरामकथा का शाश्वत संदेश
जगद्गुरु ने अंत में कहा कि श्रीरामकथा आज भी समाज को यही संदेश देती है कि पिता से संस्कार, गुरु से ज्ञान, तप से सामर्थ्य और धर्म से जीवन को सही दिशा प्राप्त होती है।
श्रीराम का विश्वामित्र के साथ अयोध्या से निकलना केवल एक यात्रा नहीं थी, बल्कि यह धर्म, ज्ञान, सेवा और मर्यादा की उस दिव्य यात्रा का प्रारम्भ था, जिसका संदेश आज भी संपूर्ण मानव समाज के लिए प्रासंगिक है।
इस अवसर पर ऋषिचैतन्यजी महाराज, चेतननाथजी महाराज, श्रीराम कथा मनोरथी केवलाजी कस्तुराजी पुरोहित पालड़ी, प्रवीणजी सांवताजी पुरोहित पालड़ी, देवाराम जागरवाल, रघुनाथसिंह राजपुरोहित, बलवंतराज अणखोल, सीईओ आलोक सिंहल, भरतसिंह बसंत, देवाराम डिगारी, सुरेश कुमार नून, कैलाश सांथू, मंगलसिंह बागरा, बिहारीलाल बसंत सहित हजारों गोभक्त उपस्थित रहे।
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