राजस्थान

सीकर के लाल देशराज सिंह शहीद: अरुणाचल में शहीद हुए सीकर के देशराज सिंह तंवर

thinQ360 · 28 अप्रैल 2026, 08:25 रात
सीकर के जवान देशराज सिंह अरुणाचल में शहीद, छुट्टी पर घर आने वाले थे लेकिन तिरंगे में लिपटे आए।

सीकर | राजस्थान के सीकर जिले के पाटन क्षेत्र के काचरेड़ा गांव में उस समय मातम छा गया जब उनके लाड़ले लाल देशराज सिंह तंवर की शहादत की खबर आई। अरुणाचल प्रदेश की दुर्गम पहाड़ियों में देश की सीमा की रक्षा करते हुए देशराज सिंह ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है।

शहादत की दुखद घटना

25 अप्रैल का वह दिन सीकर के इस परिवार के लिए कभी न भूलने वाला दुख लेकर आया जब एक अचानक हुए भूस्खलन ने जवान को छीन लिया। देशराज सिंह तंवर अपनी ड्यूटी पर तैनात थे और सीमा पर गश्त कर रहे थे तभी अचानक प्रकृति का कहर उन पर टूट पड़ा और वे शहीद हो गए।

गश्त के दौरान हुआ हादसा

शहीद के चाचा दशरथ सिंह ने बताया कि 25 अप्रैल को देशराज सिंह अपने 12 साथियों के साथ बॉर्डर पर नियमित गश्त कर रहे थे। दोपहर के करीब 2 बज रहे थे जब देशराज के 10 साथी गश्त करते हुए थोड़ा आगे निकल गए थे और वे पीछे रह गए थे।

भूस्खलन की चपेट में आए जवान

देशराज सिंह और उनके दो अन्य साथी पीछे चल रहे थे कि तभी अचानक पहाड़ से मलबा गिरा और तीनों जवान उसकी चपेट में आ गए। इस दर्दनाक हादसे में देशराज सिंह समेत दो जवान मौके पर ही शहीद हो गए जबकि एक अन्य जवान गंभीर रूप से घायल हो गया।

घर आने की थी तैयारी

सबसे ज्यादा भावुक कर देने वाली बात यह है कि देशराज सिंह 28 अप्रैल को छुट्टी लेकर अपने घर आने वाले थे। परिवार उनके स्वागत की तैयारी कर रहा था लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था और उनकी पार्थिव देह घर पहुंची।

अंतिम बातचीत की यादें

देशराज सिंह ने शहीद होने से मात्र तीन दिन पहले यानी 22 अप्रैल को ही घर पर अपनी पत्नी तमन्ना सिंह से फोन पर विस्तार से बात की थी। उन्होंने अपनी 2 साल की नन्हीं बेटी के हालचाल पूछे थे और घर आने की खुशी जाहिर की थी लेकिन वह उनकी आखिरी बात साबित हुई।

शादी और परिवार

देशराज सिंह की शादी साल 2023 में हुई थी और उनका वैवाहिक जीवन अभी शुरू ही हुआ था कि यह वज्रपात हो गया। उनकी एक दो साल की छोटी बेटी है जिसे शायद अभी यह भी नहीं पता कि उसके पिता अब कभी वापस नहीं लौटेंगे।

सेना में भर्ती का सफर

देशराज सिंह के चाचा सुबे सिंह ने बताया कि देशराज बचपन से ही देशभक्ति के जज्बे से भरे हुए थे और जुलाई 2019 में वे सेना में भर्ती हुए थे। वे भारतीय सेना की ग्रेनेडियर यूनिट में तैनात थे और हमेशा अपनी ड्यूटी को लेकर बहुत ही ज्यादा गंभीर और समर्पित रहते थे।

छुट्टी के बाद वापसी

वे इसी साल 13 जनवरी को अपने घर आए थे और एक महीने की लंबी छुट्टी बिताने के बाद 14 फरवरी को वापस अपनी ड्यूटी पर लौटे थे। उन्हें क्या पता था कि फरवरी में घर से विदा लेना उनका आखिरी विदाई संदेश होगा और वे अब तिरंगे में लिपटकर आएंगे।

मामा के बेटे की शादी

7 मई को देशराज सिंह के ससुराल में एक बड़ा पारिवारिक कार्यक्रम प्रस्तावित था जिसमें उन्हें शामिल होना था। इसके ठीक बाद 10 मई को उनके मामा के बेटे की शादी थी जिसके लिए उन्होंने विशेष रूप से 28 अप्रैल से छुट्टी ली थी।

भाई को मिली सूचना

25 अप्रैल की शाम को देशराज के बड़े भाई भोजराज सिंह को आर्मी हेडक्वार्टर से फोन के जरिए इस दुखद घटना की आधिकारिक सूचना मिली थी। भोजराज सिंह खुद भी सेना में सिपाही के पद पर तैनात हैं और वर्तमान में उनकी पोस्टिंग जम्मू-कश्मीर के चुनौतीपूर्ण इलाके में है।

सैनिक परिवार की विरासत

देशराज सिंह का पूरा परिवार ही भारतीय सेना और देश सेवा को समर्पित रहा है जो क्षेत्र के युवाओं के लिए प्रेरणा का केंद्र है। उनके दादा भगवान सिंह भी सेना से रिटायर्ड हैं और उन्होंने भी कई वर्षों तक देश की सीमाओं की सुरक्षा में अपना योगदान दिया है।

तिरंगा यात्रा का आयोजन

मंगलवार सुबह 8 बजे जब देशराज सिंह की पार्थिव देह पाटन थाने पहुंची तो वहां हजारों की संख्या में स्थानीय युवा और ग्रामीण एकत्र हो गए। वहां से शहीद के पैतृक गांव काचरेड़ा तक 6 किलोमीटर लंबी एक ऐतिहासिक और भव्य तिरंगा यात्रा निकाली गई जिसमें देशभक्ति के नारे गूंजे।

पूरे रास्ते फूलों की बारिश

तिरंगा यात्रा के दौरान रास्ते में जगह-जगह ग्रामीणों और युवाओं ने शहीद की पार्थिव देह पर पुष्पवर्षा कर उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। 'देशराज सिंह अमर रहें' और 'भारत माता की जय' के नारों से पूरा इलाका गुंजायमान हो गया और हर आंख नम नजर आई।

गांव में गमगीन माहौल

शहीद की पार्थिव देह जैसे ही उनके पैतृक गांव काचरेड़ा पहुंची तो वहां कोहराम मच गया और वीरांगना तमन्ना देवी का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। गांव की महिलाओं और परिजनों ने उन्हें बड़ी मुश्किल से संभाला क्योंकि यह दुख सहन करना किसी के लिए भी आसान नहीं था।

अंतिम संस्कार की रस्में

दोपहर 12 बजे घर से करीब एक किलोमीटर दूर स्थित श्मशान घाट में शहीद देशराज सिंह की पार्थिव देह का पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। सेना की एक विशेष टुकड़ी ने हवा में गोलियां दागकर अपने साथी वीर जवान को अंतिम सलामी दी और सम्मान प्रकट किया।

तिरंगा सौंपने का भावुक पल

अंतिम संस्कार से पहले सेना के अधिकारियों ने शहीद देशराज सिंह के पिता उदय सिंह को वह तिरंगा सौंपा जिसमें उनका बेटा लिपटकर आया था। यह दृश्य इतना भावुक था कि वहां मौजूद हर शख्स की आंखों से आंसू छलक पड़े और वातावरण पूरी तरह से गमगीन हो गया।

चचेरे भाई ने दी मुखाग्नि

शहीद देशराज सिंह के चाचा के बेटे रवि सिंह ने उनकी पार्थिव देह को मुखाग्नि दी और अंतिम विदाई की रस्में पूरी कीं। देशराज अपने तीन भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थे और पूरे परिवार की उम्मीदों का बड़ा सहारा थे जो अब टूट चुका है।

एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व

"देशराज केवल एक सैनिक नहीं बल्कि हमारे गांव का गौरव था जिसने देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी। उसकी कमी कभी पूरी नहीं हो सकती लेकिन हमें उसकी शहादत पर गर्व है।" - शहीद के चाचा दशरथ सिंह

पहाड़ी क्षेत्रों की चुनौतियां

अरुणाचल प्रदेश जैसे ऊंचे और पहाड़ी क्षेत्रों में भारतीय सेना के जवानों को हर दिन कठिन परिस्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है। देशराज सिंह जैसे वीर जवान इन्हीं चुनौतियों के बीच रहकर हमारी सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं और अपनी जान की बाजी लगाते हैं।

युवाओं के लिए संदेश

शहीद देशराज सिंह की अंतिम यात्रा में शामिल हुए युवाओं ने कहा कि वे देशराज के बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने देंगे। उन्होंने संकल्प लिया कि वे भी सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करेंगे और देशराज के दिखाए रास्ते पर चलकर गौरव हासिल करेंगे।

प्रशासनिक अधिकारियों की उपस्थिति

अंतिम संस्कार के दौरान जिले के कई प्रशासनिक अधिकारी और स्थानीय जनप्रतिनिधि भी शहीद को श्रद्धांजलि देने के लिए गांव पहुंचे थे। उन्होंने पीड़ित परिवार को ढांढस बंधाया और सरकार की ओर से हर संभव मदद मुहैया कराने का पूरा भरोसा दिलाया है।

शहादत का सम्मान

राजस्थान की यह वीर धरा हमेशा से ही ऐसे जांबाज सैनिकों को जन्म देती आई है जिन्होंने मातृभूमि के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दी है। देशराज सिंह तंवर का नाम भी अब राजस्थान के उन महान शहीदों की सूची में स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो गया है।

गांव का गर्व

काचरेड़ा गांव के लोग बताते हैं कि देशराज जब भी छुट्टी पर घर आता था तो वह बहुत ही मिलनसार स्वभाव के साथ सबसे मिलता था। वह गांव के बच्चों को सेना में जाने के लिए प्रेरित करता था और उन्हें दौड़ लगाने व मेहनत करने के गुर सिखाया करता था।

अंतिम विदाई का सारांश

सीकर के इस लाल ने जिस बहादुरी के साथ देश की सेवा की और अंत में शहादत प्राप्त की वह आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल रहेगी। पूरा देश आज शहीद देशराज सिंह तंवर की वीरता को नमन कर रहा है और उनके परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदनाएं व्यक्त कर रहा है।

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