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पल्स पोलियो अभियान में मार्कर खरीद पर सवाल: स्वास्थ्य महकमे में मार्कर की स्याही से सेहत का खेला: पल्स पोलियो अभियान में इंडीलेबल की जगह परमानेंट मार्कर का इस्तेमाल

गणपत सिंह मांडोली · 03 जुलाई 2026, 10:35 रात
सिरोही में पल्स पोलियो अभियान के दौरान निर्धारित इंडीलेबल मार्कर की बजाय सामान्य परमानेंट मार्कर खरीदे और उपयोग किए जाने का मामला सामने आया है। इससे बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।

सिरोही | स्वास्थ्य विभाग के पल्स पोलियो अभियान में निर्धारित मानकों की अनदेखी का मामला सामने आया है। जानकारी के अनुसार अभियान के दौरान बच्चों की उंगली पर निशान लगाने के लिए उपयोग किए जाने वाले इंडीलेबल मार्कर की जगह सामान्य परमानेंट मार्कर खरीदे और उपयोग किए गए। इस घटनाक्रम ने बच्चों की सुरक्षा और अभियान की गुणवत्ता को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

मानकों के विपरीत हुई खरीद

बताया जा रहा है कि इस बार राज्य स्तर से इंडीलेबल मार्कर उपलब्ध नहीं हो सके। इसके बाद स्थानीय स्तर पर खरीद करने के निर्देश दिए गए, लेकिन निर्धारित मानकों के अनुरूप इंडीलेबल मार्कर खरीदने के बजाय सामान्य स्टेशनरी में मिलने वाले परमानेंट मार्कर खरीद लिए गए। इन्हीं मार्करों का उपयोग पोलियो की खुराक पिलाने के बाद बच्चों की उंगली पर निशान लगाने के लिए किया गया।

"इंडीलेबल मार्कर राज्य स्तर से नहीं आए थे। वहां से निर्देश मिलने के बाद ही स्थानीय स्तर से खरीद की गई है।"
- डॉ. दिनेश खराड़ी, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, सिरोही

क्या कहती हैं स्वास्थ्य संबंधी गाइडलाइन?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) तथा राष्ट्रीय पल्स पोलियो कार्यक्रम की गाइडलाइन के अनुसार बच्चों की उंगली पर निशान लगाने के लिए केवल इंडीलेबल मार्कर का उपयोग किया जाना चाहिए। इसकी स्याही त्वचा के लिए सुरक्षित होती है और यदि कोई बच्चा गलती से ताजा निशान को मुंह में डालकर चाट भी ले तो उससे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।

सामान्य परमानेंट मार्कर से क्या हो सकता है खतरा?

चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार सामान्य स्टेशनरी या परमानेंट मार्कर त्वचा पर उपयोग के लिए तैयार नहीं किए जाते। इनमें मौजूद कुछ रासायनिक तत्व बच्चों के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं। यदि कोई बच्चा ताजा स्याही को बार-बार मुंह में ले जाए तो मुंह में जलन, मतली, उल्टी, पेट संबंधी परेशानी या त्वचा पर एलर्जी जैसी समस्याएं उत्पन्न होने की आशंका रहती है।

उठ रहे हैं कई अहम सवाल

इस पूरे मामले के बाद कई सवाल सामने आ रहे हैं। क्या बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े राष्ट्रीय अभियान में निर्धारित गाइडलाइन की अनदेखी हुई? यदि स्थानीय स्तर पर खरीद करनी ही थी तो इंडीलेबल मार्कर क्यों नहीं खरीदे गए? क्या परमानेंट और इंडीलेबल मार्कर की कीमत में कोई अंतर है? और यदि मानकों का उल्लंघन हुआ है तो इसकी जवाबदेही किसकी तय होगी?

अब देखना होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस मामले की जांच कराता है या नहीं तथा भविष्य में ऐसे अभियानों में निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

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