नई दिल्ली | सोशल मीडिया आज के दौर में सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं रह गया है। यह किशोरों के लिए एक ऐसा मायाजाल बन चुका है, जिससे निकलना उनके लिए नामुमकिन होता जा रहा है। हालिया शोध बताते हैं कि मेटा और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स की 'एडिक्टिव डिजाइन' किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को तबाह कर रही है। यह समस्या अब केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि वैश्विक संकट बन गई है।
दिमाग पर डोपामिन का सीधा हमला
न्यूरोसाइंस के अनुसार, सोशल मीडिया पर मिलने वाले लाइक और कमेंट्स दिमाग में डोपामिन का स्तर बढ़ा देते हैं। डोपामिन वह केमिकल है जो हमें खुशी और संतुष्टि का अहसास कराता है। किशोरों का दिमाग इस 'डोपामिन हिट' का आदि हो जाता है। जब उन्हें यह प्रतिक्रिया नहीं मिलती, तो वे चिड़चिड़े और उदास होने लगते हैं। यह बिल्कुल किसी नशीले पदार्थ की लत जैसा है।
'अंडर कंस्ट्रक्शन' है किशोरों का दिमाग
टीनएजर्स के दिमाग को एक निर्माणाधीन हाईवे की तरह समझा जा सकता है। दिमाग का वह हिस्सा जो भावनाओं को नियंत्रित करता है, वह इस उम्र में बहुत सक्रिय होता है। हालांकि, फैसले लेने और खुद पर नियंत्रण रखने वाला हिस्सा (प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स) अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ होता। इसी कारण किशोर ऑनलाइन रिजेक्शन को बहुत गहराई से महसूस करते हैं। नकारात्मक कमेंट्स या कम लाइक्स उन्हें मानसिक रूप से तोड़ देते हैं। वे अपनी तुलना दूसरों से करने लगते हैं, जिससे हीनभावना और आत्म-घृणा पैदा होती है।
9,000 किशोरों पर चौंकाने वाली रिसर्च
8 देशों के 9,000 से अधिक किशोरों पर की गई एक विस्तृत रिसर्च ने डराने वाले नतीजे पेश किए हैं। इसमें सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग का सीधा संबंध एंग्जायटी से पाया गया है। रिसर्च के मुताबिक, जो किशोर स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताते हैं, उनमें डिप्रेशन के लक्षण अधिक होते हैं। कनाडा जैसे देशों में युवाओं की मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण अब आत्महत्या बन चुका है।
मेटा और यूट्यूब पर कानूनी शिकंजा
लॉस एंजिल्स की एक जूरी ने हाल ही में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। जूरी ने माना कि मेटा और यूट्यूब की एडिक्टिव डिजाइन ने एक युवा यूजर को गंभीर मानसिक क्षति पहुंचाई है। इस फैसले के बाद टेक कंपनियों की जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि ये कंपनियां जानबूझकर ऐसे फीचर्स बनाती हैं, जिनसे यूजर स्क्रीन से चिपका रहे।
दोस्ती का भ्रम और बढ़ता अकेलापन
मेटा के अपने डेटा से पता चलता है कि यूजर्स प्लेटफॉर्म पर दोस्तों से बात करने के लिए नहीं आते। इंस्टाग्राम पर बिताए गए समय का केवल 7% ही बातचीत में खर्च होता है। बाकी 93% समय केवल रील्स और फोटो स्क्रॉल करने में निकल जाता है। फेसबुक पर भी यह आंकड़ा केवल 17% है। लोग ऑनलाइन तो हैं, लेकिन वे असल में एक-दूसरे से कट रहे हैं।
शारीरिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर
सोशल मीडिया की लत केवल मानसिक ही नहीं, बल्कि शारीरिक समस्याएं भी पैदा कर रही है। देर रात तक फोन चलाने से किशोरों की नींद पूरी नहीं हो पा रही है। नींद की कमी से मोटापे और चिड़चिड़ेपन की समस्या बढ़ रही है। फिजिकल एक्टिविटी कम होने के कारण किशोरों में मेटाबॉलिक बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है।
वैश्विक स्तर पर पाबंदियों की शुरुआत
दुनियाभर के देश अब इस खतरे को भांप चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस जैसे देशों ने किशोरों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर कड़े नियम और पाबंदियां लागू कर दी हैं। भारत में भी विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को इस डिजिटल नशें से बचाने के लिए सख्त गाइडलाइन्स की जरूरत है। माता-पिता को भी बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नजर रखनी होगी।
कैसे बचें इस डिजिटल जाल से?
विशेषज्ञों का सुझाव है कि बच्चों को आउटडोर गेम्स और रचनात्मक गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। घर में 'नो फोन जोन' और 'डिजिटल डिटॉक्स' का पालन करना जरूरी है। किशोरों को यह समझाना होगा कि सोशल मीडिया पर दिखने वाली दुनिया असली नहीं है। मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना ही इस समस्या का एकमात्र स्थाई समाधान है।