सिरोही | राजस्थान की अरावली पहाड़ियों के बीच स्थित टोकरा बांध अपनी अनोखी बनावट और धार्मिक आस्था के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ का सोनाधारी महादेव मंदिर साल के नौ महीने पानी की गहराइयों में समाया रहता है।
यह मंदिर अपनी अद्भुत भौगोलिक स्थिति के कारण पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना रहता है। चारों ओर ऊँची पहाड़ियों से घिरा यह बांध किसानों के लिए जीवनरेखा समान है।
बांध के बिल्कुल बीचों-बीच स्थित सोनाधारी महादेव मंदिर यहाँ की सबसे बड़ी धार्मिक पहचान है। यह मंदिर साल में केवल तीन महीने ही श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए उपलब्ध होता है।
जलमग्न महादेव: आस्था का अनोखा केंद्र
अप्रैल के अंत या मई के पहले सप्ताह में जब भीषण गर्मी से जल स्तर गिरता है, तब यह मंदिर जलमुक्त होता है। इसके बाद ही श्रद्धालु यहाँ पूजा कर पाते हैं।
जैसे ही जुलाई महीने में मानसूनी बारिश का दौर शुरू होता है, मंदिर फिर से धीरे-धीरे पानी में समा जाता है। अगले नौ महीनों तक यहाँ सिर्फ पानी ही दिखता है।
श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए प्रशासन और स्थानीय लोगों ने बांध के किनारे एक वैकल्पिक मंदिर भी बनाया है। यहाँ नियमित रूप से महादेव की पूजा-अर्चना की जाती है।
अरावली की पहाड़ियों से आने वाले झरनों का पानी इस मंदिर का अभिषेक करता है। स्थानीय लोगों के लिए यह नजारा किसी दैवीय चमत्कार से कम नहीं होता है।
टोकरा बांध की भराव क्षमता और जल प्रबंधन
टोकरा बांध की कुल भराव क्षमता 31 फीट निर्धारित की गई है। इसमें से 7 फीट पानी हमेशा पेयजल के लिए आरक्षित रखा जाता है ताकि गर्मी में संकट न हो।
जलदाय विभाग ने आसपास के गाँवों में पानी की किल्लत को देखते हुए यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया था। शुरुआत में किसानों ने इस फैसले का थोड़ा विरोध भी किया था।
बाद में आपसी सहमति और जनहित को देखते हुए किसानों ने 7 फीट पानी रिजर्व रखने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। अब यह व्यवस्था सुचारु रूप से चल रही है।
यह बांध कृषि के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इससे लगभग 1042 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है, जो क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का आधार है।
किसानों के लिए वरदान है 8 किलोमीटर लंबी नहर
बांध से निकलने वाली 8 किलोमीटर लंबी मुख्य नहर पीथापुरा, पामेरा, पोसितरा, मालगांव, हाथल और गुलाबगंज जैसे गाँवों तक पानी पहुँचाती है। इससे हजारों किसान लाभान्वित होते हैं।
सिंचाई के लिए किसानों से प्रति बीघा मात्र 25 रुपए का मामूली शुल्क लिया जाता है। जल वितरण समिति नियमित बैठकों के माध्यम से पानी के बंटवारे का निर्णय लेती है।
रबी की गेहूं फसल के लिए चार-चार पाण पानी देने का निर्णय इस बार लिया गया था। किसानों ने समय रहते नहरों की सफाई कर पानी की बर्बादी को रोका है।
पहाड़ी क्षेत्रों में अच्छी बारिश होने पर यह बांध लगभग हर साल ओवरफ्लो हो जाता है। इससे रबी की फसल के लिए पर्याप्त पानी और बेहतर उत्पादन सुनिश्चित होता है।
नहरों की जर्जर स्थिति और सुधार की मांग
टोकरा बांध को बने करीब 59 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन इसकी नहरों की हालत अब चिंताजनक हो गई है। कई स्थानों पर नहरें पूरी तरह जर्जर हो चुकी हैं।
नहरों के किनारे हर साल बबूल की घनी झाड़ियां उग आती हैं। इन्हें साफ करने के लिए मजदूरों और मशीनों की मदद लेनी पड़ती है, जो एक बड़ा खर्च है।
"नहरों की स्थिति जर्जर है और मालगांव व पीथापुरा में पुलिया निर्माण की मांग लंबे समय से लंबित है। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए।" - भरत सिंह देवड़ा
समिति अध्यक्ष भरत सिंह देवड़ा के अनुसार, बुनियादी ढांचे में सुधार न होने से सिंचाई में परेशानी आती है। पुलिया निर्माण न होने से ग्रामीणों का आवागमन भी बाधित होता है।
सोनाधारी महादेव मंदिर और टोकरा बांध का संगम प्रकृति और आस्था का एक अद्भुत उदाहरण पेश करता है। बांध के उचित रखरखाव से पर्यटन की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं।
निष्कर्षतः, यह स्थान न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है बल्कि हजारों परिवारों के भरण-पोषण का साधन भी है। इसकी जर्जर नहरों का जीर्णोद्धार समय की मुख्य मांग है।
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