हॉर्मोजगान | पश्चिम एशिया में इन दिनों बारूद की गंध फैली हुई है। ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच तनाव अब एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर आ गया है, जहाँ से पूरी दुनिया का बाजार हिल सकता है। इस तनाव का केंद्र कोई शहर नहीं, बल्कि एक संकरा समुद्री रास्ता है। इसे दुनिया 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' यानी होर्मुज जलडमरूमध्य के नाम से जानती है। यहाँ की लहरों में छिपी है वैश्विक राजनीति की असली कहानी। ईरान ने अपनी युद्ध रणनीति के तहत इस महत्वपूर्ण रास्ते को बंद करने की धमकी दी है। ईरान यहाँ से गुजरने वाले जहाजों पर टोल टैक्स लगाने की योजना बना रहा है। इस कदम ने अमेरिका को बुरी तरह भड़का दिया है।
जंग का नया धुरा: होर्मुज जलडमरूमध्य
अमेरिका ने ईरान को सख्त चेतावनी दी है कि अगर 48 घंटों में यह रास्ता नहीं खुला, तो परिणाम गंभीर होंगे। लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस छोटे से समुद्री इलाके के लिए दुनिया की महाशक्तियां क्यों लड़ रही हैं? होर्मुज जलडमरूमध्य की भौगोलिक बनावट इसे कुदरत का एक अनमोल तोहफा बनाती है। यह रास्ता फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल यहीं से होकर गुजरता है। अगर यह रास्ता बंद होता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है। यही कारण है कि आज यह इलाका जंग का नया धुरा बन चुका है। पहले यह लड़ाई परमाणु हथियारों के लिए थी, लेकिन अब यह व्यापारिक वर्चस्व पर आ गई है।
कौन थे यहाँ के असली मूल निवासी?
जब हम होर्मुज के इतिहास में झांकते हैं, तो एक समृद्ध संस्कृति की तस्वीर उभरती है। यहाँ के असली मूल निवासी वे लोग थे जिन्होंने सदियों पहले भारत, फारस और अरब दुनिया के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित किए थे। इन मूल निवासियों ने इस क्षेत्र को सांस्कृतिक रूप से काफी विविधतापूर्ण बना दिया था। यहाँ के शासक बहुत दूरदर्शी थे। उन्होंने समुद्र के बीच इस छोटे से इलाके को व्यापार का एक बड़ा हब बना दिया था। यहाँ रहने वाले लोग मुख्य रूप से मछुआरे और व्यापारी थे। वे समुद्र की नब्ज पहचानते थे। उनके पास ऐसे जहाज थे जो उस दौर में भारत के पश्चिमी तटों तक आसानी से पहुँच जाते थे।
नाम के पीछे की दिलचस्प कहानी
'होर्मुज' नाम की उत्पत्ति भी काफी रोचक है। माना जाता है कि यह मिडिल फारसी या जोरास्ट्रियन भाषा के शब्द 'हुर-मोग' से आया है। स्थानीय फारसी में इसका अर्थ 'खजूरों की जगह' होता है। यह नाम ही इस क्षेत्र पर फारसी प्रभाव का सबसे बड़ा सबूत है। समुद्री तटीय इलाका होने के कारण यहाँ अरब संस्कृति की झलक भी मिलती है। वंश परंपरा के हिसाब से यहाँ के लोग अरब और फारसी दोनों मूल के रहे हैं। यहाँ की आबोहवा और व्यापारिक संभावनाओं ने इसे हमेशा से बाहरी ताकतों के निशाने पर रखा। प्राचीन काल से ही यहाँ रेशम, मसाले और घोड़ों का व्यापार बड़े पैमाने पर होता रहा है।
आबादी का पलायन और नए द्वीपों का उदय
इतिहास बताता है कि मुख्य भूमि पर होने वाले हमलों के कारण यहाँ की आबादी धीरे-धीरे द्वीपों की ओर शिफ्ट होने लगी। कलहात और दक्षिणी फारस में जब अस्थिरता बढ़ी, तो लोग सुरक्षा की तलाश में समुद्र के बीच बसे। खासकर होर्मुज द्वीप की ओर लोगों का रुझान बढ़ा। इससे पहले केश्म और किश जैसे द्वीप भी बड़े शहरी केंद्रों के रूप में विकसित हुए। इन द्वीपों ने व्यापारिक किलों का रूप ले लिया था। पलायन की इस प्रक्रिया ने यहाँ की जनसांख्यिकी को बदल दिया। लोग अपनी सुरक्षा के लिए समुद्री दुर्गों पर निर्भर हो गए। यही वह समय था जब होर्मुज की पहचान एक अजेय व्यापारिक केंद्र के रूप में स्थापित हुई।
पुर्तगाली शासन और समुद्री 'टोल' का इतिहास
होर्मुज के इतिहास में एक काला अध्याय तब जुड़ा जब 1515 में पुर्तगालियों ने यहाँ कब्जा कर लिया। पुर्तगाली कमांडर अफोंसो डी अल्बुकर्क ने इस सामरिक स्थान के महत्व को पहचान लिया था। पुर्तगालियों ने यहाँ लगभग 100 सालों तक राज किया। उन्होंने 'कार्टाज' नाम की एक समुद्री कर प्रणाली लागू की। यह बिल्कुल वैसा ही था जैसा आज ईरान टोल टैक्स के रूप में लागू करना चाहता है। उस समय किसी भी जहाज को यहाँ से गुजरने के लिए पुर्तगालियों को पैसे देने पड़ते थे। अगर कोई टैक्स नहीं देता, तो उसके जहाज को डुबो दिया जाता था। इस प्रणाली ने पुर्तगालियों को बेहिसाब दौलत दी।
शाह अब्बास और आधुनिक ईरान का नियंत्रण
साल 1622 में इतिहास ने एक बार फिर करवट ली। फारस के शक्तिशाली शासक शाह अब्बास प्रथम ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की मदद से पुर्तगालियों को होर्मुज से बाहर खदेड़ दिया। पुर्तगालियों की हार के बाद यह क्षेत्र पूरी तरह से फारसी नियंत्रण में आ गया। शाह अब्बास ने यहाँ के व्यापार को फिर से संगठित किया। धीरे-धीरे यहाँ की जनसंख्या मुख्य रूप से ईरानी यानी फारसी हो गई। आज यह पूरा इलाका ईरान के होर्मोजगान प्रांत का हिस्सा है। सदियों बाद भी यहाँ का भूगोल नहीं बदला, लेकिन राजनीति फिर से उसी मोड़ पर आ गई है जहाँ टैक्स और नियंत्रण को लेकर तलवारें खिंची हुई हैं।
निष्कर्ष: क्या फिर बदलेगा इतिहास?
होर्मुज का इतिहास गवाह है कि जिसने इस रास्ते पर कब्जा किया, उसने दुनिया के व्यापार पर राज किया। आज ईरान उसी ऐतिहासिक वर्चस्व को दोहराने की कोशिश कर रहा है, जबकि अमेरिका उसे रोकने पर आमादा है। यहाँ के मूल निवासी तो अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं, लेकिन उनकी विरासत आज भी इस समुद्री रास्ते के महत्व के रूप में जीवित है। आने वाले दिन तय करेंगे कि होर्मुज की लहरें शांति की ओर बढ़ेंगी या युद्ध की ओर।