विश्वविद्यालय कैम्पस | विश्वविद्यालय में बुनियादी सुविधाओं की लगातार बिगड़ती स्थिति और प्रशासनिक उदासीनता के खिलाफ छात्र नेता शुभम रेवाड़ ने विरोध का एक रचनात्मक तरीका अपनाया है। उन्होंने एक नुक्कड़ नाटक के माध्यम से नए छात्रों से साफ पानी जैसी सुविधाओं के लिए व्यंग्यात्मक 'वीसी टैक्स' की मांग कर प्रशासन को आईना दिखाया है।
नुक्कड़ नाटक से 'सुविधा घोटाले' का पर्दाफाश
नए शैक्षणिक सत्र के आरंभ में, जब नए छात्र दाखिले के लिए पहुंच रहे थे, शुभम रेवाड़ और उनकी टीम ने मुख्य द्वार पर एक सजीव नुक्कड़ नाटक का मंचन किया।
इस नाटक का उद्देश्य नए छात्रों को कैंपस की जमीनी हकीकत से अवगत कराना था। नाटक में दिखाया गया कि छात्रों द्वारा चुकाई गई मोटी फीस सिर्फ कैंपस में प्रवेश का एक पास है।
शुभम ने छात्रों पर तंज कसते हुए कहा कि पीने के लिए साफ पानी, स्वच्छ शौचालय और बैठने के लिए साफ-सुथरी कक्षाएं जैसी मूलभूत जरूरतें इस फीस में शामिल नहीं हैं।
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क्या है यह 'वीसी टैक्स'?
अपने तीखे व्यंग्य में, शुभम ने इन सुविधाओं के लिए एक काल्पनिक 'वीसी टैक्स' की मांग की। यह सीधे तौर पर प्रशासन पर एक कटाक्ष था, जिसने वहां मौजूद सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया।
"आपकी मोटी फीस तो सिर्फ इस आलीशान कैंपस में पैर रखने का एक पास है; अगर आपको पीने के लिए साफ पानी चाहिए, तो उसके लिए आपको अलग से प्रीमियम चुकाना होगा।"
इस अनोखे प्रदर्शन को आम छात्रों का भारी समर्थन मिला। छात्रों ने इसे प्रशासन द्वारा उनकी जेब पर डाका डालने की कोशिश बताया।
शुभम ने स्पष्ट संदेश दिया कि प्रशासन छात्रों की बुनियादी जरूरतों को 'पेड सर्विस' में बदलकर एक बड़ा खेल खेल रहा है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
छात्र संघ चुनाव: जवाबदेही की कुंजी
शुभम रेवाड़ ने इस पूरी समस्या की जड़ विश्वविद्यालय में वर्षों से छात्र संघ चुनावों पर लगी रोक को बताया। उन्होंने कहा कि यह लोकतंत्र की हत्या है।
लोकतांत्रिक चुनाव न होने के कारण अधिकारियों की जवाबदेही पूरी तरह से समाप्त हो गई है। वे छात्रों की जायज मांगों के प्रति पूरी तरह से निरंकुश और संवेदनहीन हो गए हैं।
अधिकारियों को पता है कि उनसे सवाल पूछने वाला कोई निर्वाचित छात्र प्रतिनिधि नहीं है, इसलिए वे मनमाने फैसले ले रहे हैं।
यह आंखें खोल देने वाला प्रदर्शन एक स्पष्ट चेतावनी है। यदि प्रशासन ने अपनी नीतियों में तत्काल सुधार नहीं किया और छात्र संघ बहाली की दिशा में कदम नहीं उठाए, तो यह चिंगारी एक बड़े छात्र आंदोलन में बदल सकती है।
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