दिल्ली

चंद्रा पर कर्जदाताओं का शिकंजा: सुभाष चंद्रा की बढ़ीं मुश्किलें, NCLAT में सुनवाई आज

बलजीत सिंह शेखावत · 31 अगस्त 2026, 03:54 दोपहर
जी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा के ₹22,006 करोड़ के कर्ज के मुकाबले ₹6.25 करोड़ के रिपेमेंट प्लान पर विवाद गहरा गया है। कर्जदाताओं ने NCLT के फैसले को NCLAT में चुनौती दी है।

जी ग्रुप के फाउंडर सुभाष चंद्रा की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। कर्जदाताओं ने उनके रिपेमेंट प्लान को मंजूरी देने वाले नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के फैसले को चुनौती देने के लिए नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) का दरवाजा खटखटाया है।

इस मामले में एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस और कुछ अन्य बैंकों ने अपील दायर की है।

NCLAT में आज अहम सुनवाई

कर्जदाताओं की ओर से मामले की तत्काल सुनवाई की मांग को NCLAT ने मंजूर कर लिया है। अपीलेट ट्रिब्यूनल ने मंगलवार, 1 सितंबर को सुबह 10 बजे सुनवाई का समय तय किया है।

इससे पहले सोमवार को कर्जदाताओं की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने NCLAT से मामले की जल्द सुनवाई करने की अपील की थी।

क्या है पूरा विवाद?

इस पूरे विवाद की जड़ में NCLT का 25 अगस्त का वह फैसला है, जिसमें सुभाष चंद्रा की ओर से पेश किए गए रिपेमेंट प्लान को मंजूरी दी गई थी।

इस प्लान के तहत कर्जदाताओं को महज 6.25 करोड़ रुपये और इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया के खर्च के लिए 25 लाख रुपये का भुगतान किया जाना है।

यह प्रस्ताव तब और भी चौंकाने वाला हो जाता है जब यह पता चलता है कि चंद्रा के खिलाफ स्वीकार किए गए दावों की कुल रकम लगभग 22,006.57 करोड़ रुपये है। यही वजह है कि कई बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने इस फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

यह मामला उन व्यक्तिगत गारंटियों से जुड़ा है, जो सुभाष चंद्रा ने Essel Group से जुड़ी कंपनियों की ओर से लिए गए कर्ज के लिए दी थीं।

कर्जदाताओं ने क्यों दी फैसले को चुनौती?

आपत्ति जताने वाले बैंकों का कहना है कि पांच संस्थाएं सुभाष चंद्रा से जुड़ी हुई थीं और उन्हें रिपेमेंट प्लान पर वोट करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए थी।

वोटिंग प्रक्रिया पर उठे सवाल

NCLT के 144 पन्नों के आदेश के अनुसार, इन्हीं पांच संस्थाओं के वोटों की वजह से रिपेमेंट प्लान को कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) में कुल 80.814 फीसदी की भारी मंजूरी मिली।

जिन पांच संस्थाओं पर सवाल उठाए गए हैं, उनमें शामिल हैं:

एचडीएफसी बैंक और आईडीबीआई ट्रस्टशिप सर्विसेज की अगुवाई में असहमति जताने वाले कर्जदाताओं का तर्क है कि ये पांचों संस्थाएं इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत 'एसोसिएट्स' की श्रेणी में आती हैं। इसलिए, उनके वोटों को गिना ही नहीं जाना चाहिए था।

कौन-कौन से कर्जदाता हैं नाराज?

इस फैसले से कई बड़े वित्तीय संस्थान नाराज हैं और उन्होंने खुलकर इसका विरोध किया है।

HDFC बैंक और केनरा बैंक

एचडीएफसी बैंक, जिसके पास कुल दावों का करीब 3.2 फीसदी हिस्सा है, ने पहले ही रिपेमेंट प्लान का विरोध किया था। वहीं, केनरा बैंक (1.60% वोटिंग शेयर) ने भी प्लान का विरोध करते हुए फॉरेंसिक ऑडिट की मांग की थी, जिसे कम वोटिंग शेयर के कारण स्वीकार नहीं किया गया।

यूनियन बैंक और LIC हाउसिंग

यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (यूके) ने भी स्पष्ट किया है कि उसने इस प्लान को खारिज कर दिया था और NCLAT में इसे तुरंत चुनौती देगा। इसके अलावा, एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस ने कहा है कि वह दूसरे सरकारी वित्तीय संस्थानों के साथ मिलकर इस फैसले के खिलाफ अपील दाखिल करेगी।

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