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लिव-इन पर SC का बड़ा फैसला: सहमति से बना संबंध चरित्र पर दाग नहीं

बलजीत सिंह शेखावत · 09 जून 2026, 05:43 शाम
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बना शारीरिक संबंध चरित्र पर टिप्पणी का आधार नहीं हो सकता।

नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और बदलते सामाजिक संबंधों पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बना शारीरिक संबंध किसी के चरित्र पर सवाल उठाने का आधार नहीं हो सकता। यह टिप्पणी तेलंगाना पुलिस भर्ती से जुड़े एक मामले में की गई।

बदलते सामाजिक मानदंड और व्यक्तिगत स्वतंत्रता

न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई की। अदालत ने कहा कि भारत में सामाजिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं।

पीठ ने जोर देकर कहा कि युवाओं के बीच के रिश्तों को पुराने और संकीर्ण नजरिए से नहीं देखा जा सकता है। यह फैसला आधुनिक सोच को दर्शाता है।

शादी न होना धोखेबाजी नहीं

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर रिश्ता शादी के मुकाम तक पहुंचे, यह बिल्कुल भी जरूरी नहीं है।

सिर्फ इसलिए कि एक रिश्ता विवाह में नहीं बदला, किसी भी पक्ष को धोखेबाज या अनैतिक नहीं माना जा सकता।

अदालत के अनुसार, "दो अविवाहित वयस्कों के बीच लंबे समय तक चला संबंध सामान्य सहमति का संकेत माना जाएगा।"

कानून किसी भी दो सहमत वयस्कों को अपनी पसंद का रिश्ता बनाने की पूरी स्वतंत्रता देता है। इस फैसले ने व्यक्तिगत गरिमा और स्वतंत्रता के अधिकार को और मजबूत किया है।

तेलंगाना पुलिस भर्ती से जुड़ा मामला

यह पूरा मामला तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड (TSLPRB) से संबंधित था। एक उम्मीदवार का चयन स्टाइपेंडरी कैडेट ट्रेनी पुलिस कांस्टेबल पद के लिए हुआ था।

लेकिन, 2014 में दर्ज एक आपराधिक मामले के कारण उसकी नियुक्ति को रद्द कर दिया गया था। यह मामला शादी का झांसा देकर संबंध बनाने के आरोप से जुड़ा था।

समझौता अपराध की स्वीकारोक्ति नहीं

हालांकि, बाद में 2015 में इस मामले में लोक अदालत में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया था। उम्मीदवार ने अपने आवेदन पत्र में इस केस की जानकारी दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोक अदालत में समझौता होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है।

पीठ ने कहा कि धोखाधड़ी साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी था कि महिला को जानबूझकर धोखा दिया गया था, जिसका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला।

अदालत ने यह भी पाया कि शिकायतकर्ता पर किसी भी तरह के दबाव या धमकी का कोई सबूत नहीं था और उसने खुद मुकदमा आगे नहीं बढ़ाया।

अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती बोर्ड के नियुक्ति रद्द करने के फैसले को खारिज कर दिया। इस निर्णय ने उम्मीदवार को बड़ी राहत दी है और भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम की है, जो व्यक्तिगत रिश्तों और पेशेवर जीवन को अलग रखने पर जोर देती है।

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