नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव याचिकाओं के कानूनी पहलुओं और अपीलीय अदालतों के अधिकार क्षेत्र पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव याचिकाओं का फैसला केवल मौजूदा रिकॉर्ड के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
रिमांड और नए साक्ष्य पर रोक
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि कोई भी अपीलीय अदालत मामले को निचली अदालत में वापस (remand) नहीं भेज सकती। खासकर तब, जब मकसद नए सबूतों को जोड़ना या गवाहों की दोबारा जांच कराना हो।
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का मामला
यह विवाद एक सरपंच चुनाव में कथित 'डबल वोटिंग' से शुरू हुआ था। ट्रायल कोर्ट द्वारा चुनाव रद्द किए जाने के बाद, पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए भेज दिया था।
हाई कोर्ट ने निर्देश दिया था कि मतदाताओं की गवाही ली जाए और फिंगरप्रिंट की वैज्ञानिक जांच कराई जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को पूरी तरह से अनुचित और कानून के विरुद्ध करार दिया।
कानूनी कमियों को भरने की मनाही
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट का यह कदम मुकदमेबाजी की कमियों को भरने जैसा है। कोर्ट के अनुसार, यदि कोई मुद्दा प्रारंभिक स्तर पर नहीं उठाया गया, तो उसे बाद में जोड़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
अंतिम फैसला और निर्देश
शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट को निर्देश दिया कि वह केवल पहले से उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर मामले का निपटारा करे। यह फैसला चुनाव याचिकाओं में न्यायिक प्रक्रिया की सुचिता और समयबद्धता सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ा कदम है।