नई दिल्ली | पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों की घोषणा से ठीक पहले राज्य की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने एक बड़ा कानूनी कदम उठाया है। पार्टी ने मतगणना प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
टीएमसी ने चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी है जिसमें मतगणना केंद्रों पर केंद्र सरकार के कर्मचारियों को तैनात करने का निर्देश दिया गया है। इस मामले में अब सुप्रीम कोर्ट में तत्काल सुनवाई होने वाली है।
टीएमसी की सुप्रीम कोर्ट में तत्काल सुनवाई की मांग
पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों से महज दो दिन पहले ममता बनर्जी की पार्टी ने शीर्ष अदालत में अर्जी दाखिल की। इसमें भारत निर्वाचन आयोग के उस निर्णय को गलत बताया गया है।
आयोग ने मतगणना पर्यवेक्षक के तौर पर केवल केंद्र सरकार के कर्मचारियों को नियुक्त करने का निर्णय लिया था। टीएमसी चाहती है कि इस प्रक्रिया में राज्य सरकार के कर्मचारियों को भी शामिल किया जाए।
भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए शनिवार को ही इस पर सुनवाई के निर्देश दिए। टीएमसी के वकील ने कोर्ट से इस पर तुरंत रोक लगाने की मांग की है।
सुप्रीम कोर्ट की दो मई की केस लिस्ट के अनुसार न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ इस याचिका पर सुनवाई करेगी। पूरा देश अब इस फैसले का इंतजार कर रहा है।
कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले को दी गई चुनौती
इससे पहले तृणमूल कांग्रेस ने कलकत्ता हाई कोर्ट में इसी मांग को लेकर याचिका दायर की थी। हालांकि वहां पार्टी को कोई राहत नहीं मिली और कोर्ट ने याचिका को सिरे से खारिज कर दिया।
हाई कोर्ट के जस्टिस कृष्णा राव ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आयोग का फैसला गैर-कानूनी नहीं है।
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग के पास पर्यवेक्षकों की नियुक्ति का पूर्ण अधिकार सुरक्षित है। हाई कोर्ट ने माना कि मतगणना की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए केंद्रीय कर्मचारियों का उपयोग किया जा सकता है। इसी फैसले के खिलाफ अब टीएमसी ने देश की सबसे बड़ी अदालत में गुहार लगाई है।
केंद्र सरकार के कर्मचारियों पर टीएमसी का ऐतराज
टीएमसी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी ने दलील दी कि चुनाव आयोग का यह निर्देश बिना किसी ठोस आधार के जारी किया गया है। उन्होंने इसे क्षेत्राधिकार का उल्लंघन बताया।
पार्टी ने अपनी याचिका में चिंता जताई है कि केंद्र में भाजपा की सरकार है। ऐसे में केंद्र सरकार के कर्मचारी भाजपा के पक्ष में मतगणना को प्रभावित करने की कोशिश कर सकते हैं।
टीएमसी का कहना है कि मतगणना केंद्रों पर केवल केंद्रीय कर्मचारियों की मौजूदगी से निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं। वे चाहते हैं कि राज्य के कर्मचारियों को भी बराबर का मौका मिले।
चुनाव आयोग की दलील और कोर्ट का रुख
चुनाव आयोग के वकीलों ने कोर्ट में स्पष्ट किया कि यह नियुक्तियां पूरी तरह से तय प्रक्रिया के अनुसार की गई हैं। आयोग का मकसद केवल किसी भी तरह के पक्षपात के आरोपों को रोकना था। आयोग ने दलील दी कि केंद्रीय कर्मचारियों को प्राथमिकता देने से पारदर्शिता बनी रहती है।
उन्होंने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल को आयोग की कार्यप्रणाली पर इस तरह सवाल नहीं उठाना चाहिए। हाई कोर्ट ने भी आयोग की बात से सहमति जताई थी। कोर्ट ने कहा था कि मतगणना कक्ष में केवल सुपरवाइजर ही नहीं बल्कि माइक्रो ऑब्जर्वर और उम्मीदवारों के एजेंट भी मौजूद रहते हैं।
“सिर्फ काउंटिंग सुपरवाइजर ही रूम में नहीं होंगे। वहां माइक्रो ऑब्जर्वर और उम्मीदवारों के एजेंट भी होंगे, इसलिए धांधली का आरोप लगाना निराधार है।”
मतगणना प्रक्रिया में पारदर्शिता की चुनौती
अदालत ने कहा कि इतने सारे लोगों की मौजूदगी में किसी एक पक्ष के लिए काम करना लगभग असंभव है। याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों पर विश्वास करने का कोई ठोस कारण नजर नहीं आता। पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने 30 अप्रैल को एक पत्र जारी किया था।
इसमें कहा गया था कि हर टेबल पर कम से कम एक केंद्रीय कर्मचारी का होना अनिवार्य है। टीएमसी इसी पत्र को रद्द करने की मांग कर रही है। उनका तर्क है कि यह निर्देश केवल कोरी आशंकाओं पर आधारित है और राज्य मशीनरी पर अविश्वास पैदा करने वाला कदम है।
राजनीतिक सरगर्मी और चुनाव परिणाम का इंतजार
बंगाल चुनाव के नतीजे आने में अब बहुत कम समय बचा है। ऐसे समय में कानूनी लड़ाई ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। भाजपा और टीएमसी दोनों की नजरें कोर्ट पर टिकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला आएगा, वह भविष्य के चुनावों के लिए एक मिसाल बनेगा।
मतगणना की प्रक्रिया में शुद्धता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना ही कोर्ट की प्राथमिकता होगी। सुप्रीम कोर्ट में होने वाली यह सुनवाई तय करेगी कि बंगाल के मतगणना केंद्रों पर कौन तैनात होगा।
फिलहाल सभी की निगाहें शनिवार को होने वाली इस विशेष सुनवाई के नतीजों पर टिकी हुई हैं। यह मामला न केवल कानूनी है बल्कि राजनीतिक रूप से भी बेहद संवेदनशील है। बंगाल की जनता और राजनीतिक दल अब सुप्रीम कोर्ट के रुख का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं ताकि मतगणना शुरू हो सके।
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