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जलियांवालाबाग जैसा हत्याकांड: लिलुड़ी बडली का गोलीकांड एवं अग्निकांड के 103 वे शहादत दिवस पर गुमनाम शहीदों को श्रद्धांजलि

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जलियांवालाबाग जैसा हत्याकांड ; लिलुड़ी बडली का गोलीकांड एवं अग्निकांड (लिलुडी बडली के 103 वे शहादत दिवस पर गुमनाम शहीदों को श्रद्धांजलि)

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HIGHLIGHTS

  • आदिवासियों के इस भारी भीड़ के एकत्र होने एवं आंदोलन  की सूचना ब्रिटिश छावनी एरिनपुरा (शिवगंज) को प्राप्त होने पर वहां के मेजर प्रिचर्ड  के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना द्वारा 06 मई 1922 ई को भूला वालोंरिया के क्षेत्र समेत लिलुडी बडली नामक आदिवासियों के इस आंदोलन स्थल को घेर लिया गया ।
  • बी एन ढोंढीयाल रचित सिरोही गजेटियर्स के अनुसार इस हृदय विदारक गोलीकांड  में 1800 लोग गोलियों के शिकार हुए,
tribute to the unnamed martyrs on the 103rd martyrdom day of liluri badli shooting and fire
103 वे शहादत दिवस पर गुमनाम शहीदों को श्रद्धांजलि

सिरोही | ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पंजाब के जलियांवालाबाग में सन 1919 में हुए गोलीकांड के जैसा ही खतरनाक हत्याकांड एवं अग्निकांड सिरोही जिले के रोहिडा क्षेत्र के लिलुड़ी बडली (निकट ग्राम भूला) नामक स्थान पर घटित हुआ था । 

इतिहासकार डॉक्टर उदयसिंह डिंगार के अनुसार ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सिरोही राज्य के भूला वालोंरिया समेत क्षेत्र के आदिवासियों  द्वारा भूला ग्राम के निकट लिलुड़ी बडली नामक स्थान पर 5 मई 1922 को एकत्रित होकर स्वतंत्रता संघर्ष हेतु आंदोलन की रणनीति बनाई जा रही थी। 

आदिवासियों के इस भारी भीड़ के एकत्र होने एवं आंदोलन  की सूचना ब्रिटिश छावनी एरिनपुरा (शिवगंज) को प्राप्त होने पर वहां के मेजर प्रिचर्ड  के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना द्वारा 06 मई 1922 ई को भूला वालोंरिया के क्षेत्र समेत लिलुडी बडली नामक आदिवासियों के इस आंदोलन स्थल को घेर लिया गया । ब्रिटिश सेना द्वारा  आदिवासियों पर अंधाधुंध गोलियां चलाई गई एवं मानवता की हदें पार करते हुए क्षेत्र को आग के हवाले कर दिया गया | बी एन ढोंढीयाल रचित सिरोही गजेटियर्स के अनुसार इस हृदय विदारक गोलीकांड  में 1800 लोग गोलियों के शिकार हुए, जिसमें पुरुषों के साथ स्त्रिया एवं मासूम बच्चे भी शामिल थे। इसी के साथ ब्रिटिश सेना द्वारा क्षेत्र में अग्निकांड की जघन्य घटनाक्रम को अंजाम देने से 640 घरों के जलने, 7085 मन अनाज को जलाने या लूटने, 600 गाड़ी घास जलने,108 पशुओं के मारे जाने समेत लूटमार की मानवता को कलंकित करने वाली यह वीभत्स घटना घटित हुई। 

सैकड़ों आदिवासियो  के इस गुमनाम, लहूलुहान, रोंगटे खड़े करने वाली शहादत को आज 102 साल पूरे हो गए हैं , अर्थात 103 वा उन शहीदों का बलिदान दिवस है।इतिहास में आदिवासियों के इसआजादी के आन्दोलन में हुए लहुलुहान बलिदान एवं शहादत को उचित स्थान नहीं मिला। आदिवासियो के आज़ादी के आन्दोलन में हुए भारी नरसहार  शहादत एवं आगजनी की यह  घटना उनके लोकगीतों में समाहित है । :_

भूलू ने वालोरियू..... भूलूं गोम बेले रे ......
धोमो भाईयो.. धोमजो  ... गोरों गोला झीके रे ......
भूलूं बेले.... भूलूं बेले... भूलूं गोम बेले रे.......

आज लिलूडी बडली नामक स्थान पर शहीद स्मारक बनाया जा रहा है ।आजादी आंदोलन के इन गुमनाम शहीदों को शत-शत नमन।। 

डॉक्टर उदय सिंह डिंगार ,प्रांत उपाध्यक्ष ,भारतीय इतिहास संकलन समिति।

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