इस्लामाबाद | पाकिस्तान के लिए आर्थिक मोर्चे पर एक बहुत ही चिंताजनक खबर सामने आ रही है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने पाकिस्तान को दिया गया अपना कर्ज वापस मांग लिया है।
जानकारी के मुताबिक, UAE ने पाकिस्तान से 3.5 अरब अमेरिकी डॉलर की भारी-भरकम राशि तुरंत चुकाने को कहा है। इस मांग ने पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार की मुश्किलें काफी बढ़ा दी हैं।
वर्तमान में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जो युद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है, उसका सीधा असर अब पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है। खाड़ी देश अब अपनी वित्तीय स्थिति को लेकर सतर्क हो रहे हैं।
UAE का अचानक बदला रुख
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मिडिल ईस्ट में बढ़ते संघर्ष ने पूरे क्षेत्र के आर्थिक समीकरणों को बदल दिया है। UAE अब अपने निवेश और कर्ज को लेकर पहले से कहीं ज्यादा सावधान हो गया है।
यह 3.5 अरब डॉलर की रकम पाकिस्तान के स्टेट बैंक में ‘सेफ डिपॉजिट’ के तौर पर रखी गई थी। पाकिस्तान इस जमा राशि पर सालाना करीब 6 फीसदी की दर से ब्याज भी चुकाता रहा है।
अतीत में UAE इस कर्ज के भुगतान की समय सीमा को बार-बार टालता रहा है। लेकिन इस बार खाड़ी देश ने साफ संकेत दे दिए हैं कि वह अब और इंतजार करने के मूड में नहीं है।
क्षेत्रीय तनाव का आर्थिक प्रभाव
ईरान और इजरायल के बीच जारी खींचतान ने वैश्विक बाजारों में अस्थिरता पैदा कर दी है। ऐसे में UAE जैसे संपन्न देश अपने फंड्स को सुरक्षित और तरल (Liquid) रखना चाहते हैं।
पाकिस्तान इस समय कई देशों के साथ मिलकर मध्यस्थता करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन खुद उसकी आर्थिक स्थिति अब उसे बैकफुट पर धकेल रही है। कर्ज की यह मांग उसी का नतीजा मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अन्य कर्जदाता देश भी इसी तरह की मांग करने लगे, तो पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से खाली हो सकता है। यह स्थिति देश को डिफॉल्ट की ओर ले जा सकती है।
पाकिस्तान की मौजूदा आर्थिक स्थिति
राहत की बात यह है कि पाकिस्तान के पास फिलहाल 21 अरब डॉलर से ज्यादा का विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है। इस वजह से वह UAE का कर्ज चुकाने की स्थिति में तो है, लेकिन यह राहत अस्थाई है।
पाकिस्तान को इस चालू वित्त वर्ष में अपनी अर्थव्यवस्था चलाने के लिए करीब 12 अरब डॉलर के अतिरिक्त फंड्स की जरूरत है। इसमें सऊदी अरब और चीन जैसे देशों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होने वाली है।
अगर इन देशों ने भी UAE की तरह अपना रुख सख्त किया, तो पाकिस्तान के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पास जाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचेगा। आने वाले कुछ महीने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए अग्निपरीक्षा के समान होंगे।