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जॉनी-जॉनी यस पापा पर विवाद: यूपी मंत्री का बड़ा बयान: 'जॉनी-जॉनी यस पापा' सिखाती है झूठ

desk · 12 मई 2026, 02:10 दोपहर
यूपी के शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने अंग्रेजी कविताओं को भारतीय संस्कारों के खिलाफ बताया।

कानपुर | उत्तर प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने अंग्रेजी कविताओं को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि 'जॉनी-जॉनी यस पापा' जैसी कविताएं बच्चों को झूठ बोलना सिखाती हैं।

कानपुर में आयोजित एक भव्य शिक्षामित्र सम्मान समारोह के दौरान योगेंद्र उपाध्याय ने शिक्षा और संस्कारों के गहरे संबंधों पर अपनी बात रखी। उन्होंने पश्चिमी शिक्षा पद्धति की कड़ी आलोचना की।

पश्चिमी कविताओं से संस्कारों का ह्रास

मंत्री ने कहा कि आज की नई पीढ़ी को जिन नैतिक मूल्यों और संस्कारों की सख्त आवश्यकता है, वे पश्चिमी कविताओं से कभी प्राप्त नहीं हो सकते।

उन्होंने विशेष रूप से 'जॉनी-जॉनी यस पापा' कविता का उदाहरण दिया। उनके अनुसार, इस कविता में एक बच्चा अपने पिता से सीधे तौर पर झूठ बोल रहा है।

योगेंद्र उपाध्याय ने तर्क दिया कि ऐसी कविताएं बच्चों के कोमल मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं। यह उन्हें बचपन से ही असत्य बोलने के लिए प्रेरित करती हैं।

मंत्री ने 'रेन रेन गो अवे' जैसी लोकप्रिय कविताओं की भी निंदा की। उन्होंने कहा कि ऐसी कविताएं केवल व्यक्तिगत सुख और स्वार्थ की भावना को बढ़ावा देती हैं।

भारतीय मूल्यों और 'बहुजन हिताय' पर जोर

योगेंद्र उपाध्याय ने भारतीय मूल्यों की व्याख्या करते हुए कहा कि हमारी संस्कृति कभी भी 'स्वांत: सुखाय' यानी केवल स्वयं के सुख की बात नहीं करती है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय परंपरा हमेशा से 'बहुजन हिताय' और 'बहुजन सुखाय' के महान सिद्धांतों पर आधारित रही है। इसमें सबकी भलाई सर्वोपरि है।

मंत्री के अनुसार, पुरानी हिंदी कविताओं में जीवन के बहुत गहरे मूल्य छिपे होते थे। पिछली कई पीढ़ियां इन्हीं कविताओं को पढ़कर संस्कारवान और जिम्मेदार नागरिक बनी हैं।

हिंदी कविताओं की महत्ता और शिक्षा का उद्देश्य

योगेंद्र उपाध्याय ने जोर देकर कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल किताबी ज्ञान देना नहीं है। शिक्षा का असली मकसद बच्चों में अच्छे चरित्र का निर्माण करना है।

उन्होंने सुझाव दिया कि स्कूलों में ऐसी कविताओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जो नैतिकता और सत्य का मार्ग दिखाएं। हिंदी की प्राचीन रचनाएं इस मामले में अत्यंत समृद्ध हैं।

मंत्री ने चेतावनी दी कि विदेशी संस्कृति का अंधानुकरण हमारे समाज के भविष्य के लिए घातक साबित हो रहा है। हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटना होगा।

विशेषज्ञों की राय और अकादमिक दृष्टिकोण

मंत्री के इस विवादित बयान पर शिक्षा जगत से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय की एक प्रोफेसर ने इस मुद्दे पर अपना अलग दृष्टिकोण साझा किया है।

प्रोफेसर का मानना है कि हर कविता या कहानी को केवल नैतिकता के चश्मे से देखना उचित नहीं है। कुछ रचनाएं बच्चों के मनोरंजन के लिए भी होती हैं।

"यह कविता वास्तव में बच्चे को अकाउंटेबिलिटी सिखाती है। यह दिखाती है कि झूठ बोलकर बचना मुमकिन नहीं है। आपको अंततः प्रमाण देना ही पड़ता है।"

प्रोफेसर ने इस प्रसंग की तुलना भगवान कृष्ण और माता यशोदा के माखन चोरी वाले संवाद से भी की। उन्होंने इसे एक सामान्य बाल सुलभ व्यवहार बताया।

पाठ्यक्रम में कविताओं का स्थान और भविष्य

उल्लेखनीय है कि 'जॉनी-जॉनी यस पापा' वर्तमान में सीबीएसई के नर्सरी और प्री-स्कूल सिलेबस का एक अनिवार्य हिस्सा बनी हुई है। हालांकि यह एनसीईआरटी में शामिल नहीं है।

मंत्री के इस बयान ने अब एक नई बहस को जन्म दे दिया है। क्या प्राथमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में बड़े बदलाव की आवश्यकता है? यह सवाल अब उठने लगा है।

शिक्षा मंत्री के इस रुख से संकेत मिलता है कि आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश के शैक्षणिक ढांचे में भारतीयता और संस्कारों को लेकर नए नियम लागू हो सकते हैं।

अंततः, यह विवाद भारतीय बनाम पश्चिमी शिक्षा पद्धति की एक पुरानी बहस को नया आयाम दे रहा है। समाज के विभिन्न वर्गों में इस पर चर्चा तेज हो गई है।

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