जयपुर | आज की दुनिया बारूद के ढेर पर बैठी नजर आती है। रूस-यूक्रेन युद्ध हो या फिर अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव, हर तरफ असुरक्षा का माहौल है। ऐसे कठिन समय में शांति की तलाश कहां खत्म होगी? राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने इसका बेहद सटीक जवाब दिया है।
जयपुर के अणुविभा केंद्र में आयोजित 'विश्व नवकार महामंत्र दिवस' कार्यक्रम में देवनानी मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि जब सारा विश्व हिंसा की अग्नि में जल रहा है, तब भारत की सनातन संस्कृति और जैन धर्म के सिद्धांत आशा की एक नई किरण बनकर उभरे हैं।
देवनानी ने जोर देकर कहा कि अहिंसा और अपरिग्रह जैसे सिद्धांतों को केवल शब्दों तक सीमित रखना काफी नहीं है। आज के समय की सबसे बड़ी मांग यह है कि हम इन महान सिद्धांतों को अपने आचरण में उतारें। तभी मानवता को विनाश से बचाया जा सकता है।
वैश्विक संकट और भारत की भूमिका
विधानसभा अध्यक्ष ने वर्तमान वैश्विक हालातों पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि महाशक्तियों के टकराव ने पूरी मानवता को संकट में डाल दिया है। लेकिन ऐसे में भारत अपनी सनातन संस्कृति के जरिए दुनिया को शांति और बंधुत्व का मार्ग दिखा सकता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत ने कभी भी विश्व की 'महाशक्ति' बनने की होड़ नहीं की। हमारा लक्ष्य हमेशा से विश्व का मार्गदर्शक बनना रहा है। भारत दुनिया को कल्याण, सद्भाव और अहिंसा का रास्ता दिखाता रहा है और भविष्य में भी यह जारी रहेगा।
देवनानी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि भारत की 'निर्गुट नीति' की वजह से वैश्विक तनाव का देश पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ रहा है। यह विश्व शांति के प्रति भारत की अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
नवकार मंत्र: विज्ञान और अध्यात्म का संगम
नवकार महामंत्र की महिमा बताते हुए देवनानी ने कहा कि यह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह मंत्र बहुत प्रभावशाली है। यह आत्मा की गहराई से निकलने वाली एक दिव्य पुकार है, जो हमारे चारों ओर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।
उन्होंने कहा कि यह मंत्र किसी एक विशेष जाति या धर्म के लिए नहीं है। नवकार मंत्र तो संपूर्ण विश्व के कल्याण के लिए बना है। इसका जाप करने से न केवल मानसिक शांति मिलती है, बल्कि यह व्यक्ति के भीतर सकारात्मक बदलाव भी लाता है।
जैन जीवनशैली और पर्यावरण संरक्षण
कार्यक्रम के दौरान देवनानी ने जैन मुनियों की परंपराओं पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मुनियों द्वारा मुंह पर पट्टी लगाना कोई अंधविश्वास नहीं है। यह छोटे से छोटे जीव के प्रति सहिष्णुता और पर्यावरण के प्रति जागरूकता का एक बहुत बड़ा संदेश है।
यही सिद्धांत आज के आधुनिक विज्ञान में 'इकोलॉजी' और 'बायोडायवर्सिटी' के रूप में पढ़ाए जाते हैं। देवनानी ने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए कहा कि वे स्वयं भी 'अपरिग्रह' के सिद्धांत का पालन करने का प्रयास करते हैं, जो संसाधनों के सीमित उपयोग की सीख देता है।
इस भव्य समारोह में राष्ट्र संत आचार्य सुंदर सागर जी महाराज और मुनि सुधाकर कुमार जी सहित कई महान संतों का सानिध्य प्राप्त हुआ। कार्यक्रम में पुनीत कर्णावत, सलोनी जैन और हितेश भांडिया जैसे गणमान्य लोग भी मौजूद रहे, जिन्होंने शांति और सद्भाव का संकल्प लिया।