नई दिल्ली | पश्चिम एशिया के रेगिस्तानों में बारूद की गंध अब भारतीय रसोई तक पहुंच रही है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाजार में खलबली मचा दी है। इसका सीधा असर आपकी जेब पर पड़ने वाला है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने कंपनियों की नींद उड़ा दी है। अब वे अपने बढ़े हुए खर्चों का बोझ आम आदमी पर डालने की तैयारी में हैं। दूध से लेकर राशन और इलाज तक, सब कुछ महंगा होने जा रहा है। प्लास्टिक के कच्चे माल के दाम आसमान छू रहे हैं। इससे पैकेजिंग की लागत बढ़ गई है।
प्लास्टिक उद्योग की टूटी कमर
प्लास्टिक इंडस्ट्री इस समय सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। पिछले 30 दिनों में कच्चे माल की कीमतों में 50 से 70 फीसदी तक का उछाल देखा गया है। एलडीपीई (LDPE) जैसे प्लास्टिक दानों के दाम 110 रुपये से बढ़कर 180 रुपये प्रति किलो हो गए हैं। अन्य पॉलीमर के दाम भी 70 हजार रुपये प्रति टन तक बढ़े हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अप्रैल के अंत तक प्लास्टिक उत्पादों की कीमतों में 60 फीसदी तक की वृद्धि हो सकती है। इसमें पानी की टंकी और कंटेनर भी शामिल हैं।
बेरोजगारी का बढ़ता खतरा
ऑल इंडिया प्लास्टिक मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन (AIPMA) ने इस संकट पर गहरी चिंता जताई है। एसोसिएशन के अध्यक्ष सुनील शाह ने बड़े खतरे की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि इस उद्योग से देश के करीब 5 लाख लोग सीधे तौर पर जुड़े हैं। अगर हालात नहीं सुधरे, तो 3 लाख लोग बेरोजगार हो सकते हैं। एसोसिएशन ने सरकार से जीएसटी में कटौती की मांग की है। वे चाहते हैं कि प्लास्टिक उत्पादों पर टैक्स 18% से घटाकर 5% किया जाए ताकि उद्योग बच सके।
गैस संकट और बंद होती फैक्ट्रियां
कॉमर्शियल एलपीजी की कमी ने आग में घी डालने का काम किया है। देशभर में लगभग 20 हजार छोटे कारखानों पर ताला लग चुका है। हैदराबाद, राजकोट और रायपुर जैसे औद्योगिक केंद्रों में सन्नाटा पसरा है। राजकोट में ही 40 से ज्यादा बड़े प्लांट बंद हो चुके हैं। उद्यमियों का कहना है कि वे गैस के बिना उत्पादन नहीं कर सकते। गैस की कीमतें 150 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई हैं, जो वहन करना नामुमकिन है।
रोजमर्रा के सामानों पर महंगाई की मार
सिर्फ प्लास्टिक ही नहीं, बल्कि आपके घर का राशन भी महंगा होने वाला है। तेल, नमक और बोतलबंद पानी की कंपनियां दाम बढ़ाने पर विचार कर रही हैं। नॉन-सर्जिकल मेडिकल आइटम जैसे सिरिंज और पट्टियों के दाम भी बढ़ सकते हैं। फ्रिज और एसी जैसे कंज्यूमर ड्यूरेबल सामानों की कीमतों में भी उछाल तय माना जा रहा है। कंपनियां अब पुराने मार्जिन पर काम नहीं कर पा रही हैं। कई पैकेजिंग निर्माताओं ने पुराने ऑर्डर तक रद्द कर दिए हैं क्योंकि लागत बहुत बढ़ गई है।
बदल रहा है खान-पान का तरीका
इस संकट के बीच शहरी परिवारों के खान-पान के तरीके में बड़ा बदलाव आया है। एलपीजी की किल्लत ने 'रेडी टू ईट' उत्पादों की मांग बढ़ा दी है। क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म जैसे बिगबॉस्केट और अमेजन पर इनकी बिक्री 10 फीसदी तक बढ़ गई है। लोग अब कम गैस खर्च करने वाले विकल्पों की ओर भाग रहे हैं। इंडक्शन कुकटॉप की बिक्री में 10 गुना की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कामकाजी लोग अब ऐसे भोजन को प्राथमिकता दे रहे हैं जो 80% कम समय में पक जाए।
सीमेंट सेक्टर में भी हलचल
सीमेंट उद्योग भी इस वैश्विक संकट से अछूता नहीं है। पेटकोक और कोयले की कीमतों में अचानक आई तेजी ने उत्पादन लागत बढ़ा दी है। अनुमान है कि सीमेंट उत्पादन की लागत 200 रुपये प्रति टन तक बढ़ सकती है। हालांकि, बाजार में मांग कम होने के कारण कंपनियों को बढ़े दाम वापस लेने पड़े हैं। उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में 10-15 रुपये प्रति बोरी की वृद्धि अभी भी बनी हुई है। लेकिन पैकेजिंग के लिए इस्तेमाल होने वाला पॉलीप्रोपाइलीन महंगा होना बड़ी चुनौती है।
आगे की राह और सरकार से उम्मीद
इस आर्थिक संकट से निपटने के लिए बैंक वर्किंग कैपिटल लिमिट बढ़ाने की मांग हो रही है। कैश फ्लो की समस्या कई उद्योगों को निगल रही है। आम आदमी के लिए आने वाले दिन चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। अगर पश्चिम एशिया में तनाव कम नहीं हुआ, तो महंगाई का यह ग्राफ और ऊपर जा सकता है। फिलहाल, उपभोक्ता और उद्योग जगत दोनों ही सरकार की ओर देख रहे हैं। टैक्स में राहत और कच्चे माल की आसान उपलब्धता ही एकमात्र रास्ता नजर आता है।