कोलकाता | पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के हालिया मतदान ने भारतीय राजनीति में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। राज्य में करीब 93 प्रतिशत बंपर वोटिंग हुई है, जिसे चुनावी इतिहास का सबसे बड़ा आंकड़ा माना जा रहा है। तमिलनाडु में भी 85.1% मतदान हुआ। चुनाव आयोग की सक्रियता और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को इस भारी मतदान का मुख्य कारण माना जा रहा है। SIR के माध्यम से मृत और अनुपलब्ध मतदाताओं के नाम हटा दिए गए, जिससे मतदाता सूची अधिक पारदर्शी और सटीक हो गई।
SIR का मतदान प्रतिशत पर प्रभाव
पश्चिम बंगाल में इस प्रक्रिया के दौरान लगभग 91 लाख मतदाताओं को सूची से बाहर किया गया, जो कुल मतदाताओं का 11.63% है। जब मतदाता सूची से 'घोस्ट वोटर्स' हट जाते हैं, तो वास्तविक मतदाताओं की उपस्थिति से वोटिंग प्रतिशत में भारी उछाल आता है। 23 अप्रैल को हुए मतदान में मतदाताओं की संख्या 2021 की तुलना में 12 प्रतिशत कम थी, फिर भी प्रतिशत 10% बढ़ गया।
राजनीतिक दलों की भूमिका और जागरूकता
मतदाताओं के बीच बढ़ती जागरूकता और चुनाव आयोग के अभियानों ने भी लोगों को बूथ तक लाने में बड़ी भूमिका निभाई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दो प्रमुख गठबंधनों के बीच सीधा मुकाबला होने से भी मतदान का उत्साह बढ़ा है।
"SIR के बाद जो वोटर बचे हैं, वे 'जेनुइन' हैं और परीक्षा पास कर मतदान केंद्र तक पहुंचे हैं।"
ममता बनर्जी के लिए यह चुनाव उनके राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन परीक्षा माना जा रहा है, जिसका परिणाम 4 मई को आएगा।
निष्कर्ष और प्रभाव
यह बंपर वोटिंग सत्ता के पक्ष में है या विपक्ष के, यह तो नतीजों के बाद ही स्पष्ट होगा। फिलहाल, बंगाल और तमिलनाडु के इन आंकड़ों ने चुनावी लोकतंत्र में मतदाताओं की गहरी रुचि को एक नई दिशा दी है।
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