जयपुर | पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव की तपिश अब राजस्थान की राजधानी जयपुर के घरों तक पहुंच गई है। जैसे-जैसे ममता बनर्जी के गढ़ में चुनावी रंगत परवान चढ़ रही है, वैसे-वैसे जयपुर के खातीपुरा और वैशाली नगर जैसे इलाकों में पारा हाई हो रहा है। घरों में बर्तन बज रहे हैं और चूल्हे-चौके का मिजाज पूरी तरह बदल गया है।
चुनाव वहां, तनाव यहां
जयपुर के कई इलाकों में सुबह की हलचल अब देर तक कायम रहती है। जिन पतियों का किचन से कभी कोई सरोकार नहीं था, वे भी अब मजबूरी में हाथ बंटाते नजर आ रहे हैं। सच तो यह है कि चुनाव बंगाल में हो रहे हैं, लेकिन उसका सीधा तनाव जयपुर के परिवारों के चेहरों पर साफ दिखाई दे रहा है।
लंबी छुट्टी पर गईं सहायिकाएं
खातीपुरा और वैशाली नगर के घरों में काम करने वाली बंगाली बाइयां लंबी छुट्टी लेकर पश्चिम बंगाल वोट डालने चली गई हैं। ज्यादातर ने एक से दो महीने तक की छुट्टी ली है। मतदान के लिए उन्हें वहां के स्थानीय नेताओं और रिश्तेदारों के लगातार कॉल आ रहे हैं। एक तरफ राजनीतिक दबाव है, तो दूसरी तरफ जमीन-जायदाद हड़पने का डर उन्हें वोट डालने के लिए मजबूर कर रहा है।
गड़बड़ाया घरों का सिस्टम
सहायिकाओं के अचानक जाने से घरों की डस्टिंग, झाड़ू-पोछा और बर्तन जैसे काम ठप हो गए हैं। फुलवारी सूखने लगी है और छोटे बच्चों को संभालने में माता-पिता के पसीने छूट रहे हैं। दुधमुंहे बच्चे अपनी बंगाली 'धाय' के जाने से परेशान हैं। बुजुर्गों की दवा और सेवा का समय भी पूरी तरह से गड़बड़ा गया है।
बदल गई पुरुषों की दिनचर्या
घर के पुरुषों की नींद अब चाय से नहीं, बल्कि किचन में कूकर की सीटी से टूटती है। सिंक में पड़े बर्तन अब उन्हें खुद ही साफ करने पड़ रहे हैं। पत्नियों का स्पष्ट निर्देश है कि काम मिल-बांटकर ही होगा। गृहिणियों की बस यही तमन्ना है कि बंगाल के चुनाव जल्द संपन्न हों और उनकी बाइयां वापस लौटें।
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