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खेतोलाई के परमाणु रहस्य: पोकरण परमाणु परीक्षण क्यों चुना गया खेतोलाई गांव?

बलजीत सिंह शेखावत · 18 मई 2026, 01:32 दोपहर
जानिए कैसे खेतोलाई की भू-वैज्ञानिक संरचना भारत के परमाणु परीक्षण के लिए वरदान बनी।

पोकरण | मई 1998 में भारत ने पोकरण में परमाणु परीक्षण कर पूरी दुनिया को चौंका दिया था। इस ऐतिहासिक और रणनीतिक मिशन के लिए खेतोलाई गांव का चयन कोई संयोग नहीं था। इसके पीछे गहन भू-वैज्ञानिक अध्ययन और सुरक्षा रणनीति शामिल थी।

परमाणु परीक्षण के लिए खेतोलाई ही क्यों?

परीक्षण स्थल से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित खेतोलाई गांव अचानक वैश्विक सुर्खियों में आ गया था। वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र को इसकी अनूठी भूगर्भीय संरचना के कारण चुना था। यहां की जमीन परमाणु ऊर्जा को अवशोषित करने में सक्षम थी।

विशेषज्ञों के अनुसार, केवल चट्टानें ही नहीं, बल्कि ऊपर फैली रेत और 'लाठी सैंड स्टोन' की मोटी परत भी अहम रही। यह परत धमाके के दौरान पैदा होने वाले कंपन्न को काफी हद तक सोख लेती है।

रेडिएशन रोकने वाली ढाल: रायोलाइट चट्टानें

परमाणु विस्फोट में सबसे बड़ी चुनौती रेडिएशन को भूमिगत सीमित रखना होती है। खेतोलाई के नीचे मौजूद 'रायोलाइट' चट्टानें ज्वालामुखीय लावे के ठंडा होने से बनी हैं। ये चट्टानें इतनी सघन हैं कि इनके बीच कोई खाली जगह नहीं रहती।

इन चट्टानों की सघनता के कारण रेडियोधर्मी पदार्थ जमीन के अंदर ही कैद रहते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये चट्टानें पानी नहीं सोखतीं, जिससे भू-जल प्रदूषित होने का खतरा पूरी तरह समाप्त हो जाता है।

"खेतोलाई की अनूठी भौगोलिक स्थिति और पानी की कमी ने इसे परमाणु परीक्षणों के लिए दुनिया का सबसे आदर्श और सुरक्षित स्थान बना दिया।"

पानी की कमी जो बनी सबसे बड़ी ताकत

आमतौर पर पानी की कमी एक समस्या मानी जाती है, लेकिन पोकरण परीक्षण के लिए यह वरदान साबित हुई। इस इलाके में हजारों मीटर नीचे तक भू-जल का नामोनिशान नहीं था। यह सुरक्षा के लिहाज से बहुत जरूरी था।

यदि जमीन के नीचे पानी होता, तो विस्फोट के बाद रेडियोधर्मी तत्व पानी के जरिए दूर-दूर तक फैल सकते थे। आज भी इस गांव में पीने का पानी 30 किलोमीटर दूर लाठी गांव से पाइपलाइन द्वारा लाया जाता है।

डॉ. कलाम और मिशन की कड़ी गोपनीयता

पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने इस मिशन की कमान संभाली थी। उन्होंने अपनी पहचान छिपाने के लिए सेना की वर्दी पहनी थी। वे दो महीने तक खेतोलाई रेंज में मेजर जनरल पृथ्वीराज के रूप में तैनात रहे।

इस मिशन को इतना गुप्त रखा गया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए को भी इसकी भनक नहीं लगी। इसे सीआईए की सबसे बड़ी खुफिया विफलता माना जाता है। आज यह स्थान पर्यटन और शोध का प्रमुख केंद्र है।

खेतोलाई की यह बंजर जमीन आज भारत की सामरिक शक्ति का वैश्विक प्रतीक है। यहां के पत्थरों ने न केवल धमाकों को झेला, बल्कि देश को परमाणु संपन्न देशों की कतार में गर्व से खड़ा कर दिया।

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