भारत

दादी के गहनों से युवाओं की दूरी, सोने पर बदली नई पीढ़ी की सोच

जोगेन्द्र सिंह शेखावत · 19 जुलाई 2026, 09:54 सुबह
नई पीढ़ी सोने को विरासत से ज्यादा निवेश और आर्थिक सुरक्षा का जरिया मान रही है, जिससे पारंपरिक गहनों की मांग में भारी गिरावट आई है और निवेश के नए विकल्प उभरे हैं।

अहमदाबाद/मुंबई |

भारतीय परिवारों में सोना हमेशा से रिश्तों की धरोहर, सुरक्षा और परंपरा का प्रतीक रहा है। अलमारी के लॉकर में सालों से सहेज कर रखे दादी के हार और मां की चूड़ियां पीढ़ियों तक विरासत के रूप में सौंपे जाते थे।

लेकिन अब यह तस्वीर तेजी से बदल रही है। नई पीढ़ी, खासकर जेन-जेड और मिलेनियल्स, सोने को एक मल्टीपर्पज एसेट के रूप में देख रही है।

सोने को लेकर बदलता नजरिया

युवा पीढ़ी के लिए सोना अब सिर्फ आभूषण नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा, निवेश, घर खरीदने, उच्च शिक्षा और अपना उद्यम शुरू करने जैसे बड़े लक्ष्यों को पूरा करने का एक महत्वपूर्ण साधन बन गया है।

पहले जहां भारतीय घरों में स्वर्णाभूषण को स्त्रीधन और इमरजेंसी फंड माना जाता था, वहीं आज के युवा इसे 'डेड इन्वेस्टमेंट' के तौर पर देखते हैं। यही वजह है कि परिवार के पुराने और भारी गहनों का इस्तेमाल अब निवेश और अन्य भौतिक जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जा रहा है।

निवेश के रूप में सोने की बढ़ती मांग

इस बदलती सोच का सीधा असर बाजार पर दिख रहा है। देश में पारंपरिक गहनों की मांग घट रही है, जबकि निवेश के रूप में सोने की खरीद लगातार बढ़ रही है।

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों के अनुसार, 2026 की पहली तिमाही में सोने के गहनों की नेट डिमांड महज 30 प्रतिशत रही। यह पिछले 26 सालों का सबसे निचला स्तर है।

इसके विपरीत, सोने में निवेश जैसे कि गोल्ड बार, कॉइन और गोल्ड ETF की हिस्सेदारी रिकॉर्ड 70 प्रतिशत तक पहुंच गई।

क्यों बना रहे हैं युवा गहनों से दूरी?

नई पीढ़ी सोने को 'लिक्विड एसेट' मानती है, यानी एक ऐसी संपत्ति जिसे जरूरत पड़ने पर तुरंत नकदी में बदला जा सके। पहले जहां शादी-ब्याह या त्योहारों पर भारी-भरकम गहने खरीदे जाते थे, वहीं अब हल्की ज्वेलरी, गोल्ड बार, कॉइन और गोल्ड ईटीएफ को प्राथमिकता दी जा रही है। इसके पीछे कई ठोस कारण हैं।

आंकड़ों में सोने की बदलती मांग (पहली तिमाही)

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, सोने की मांग में एक बड़ा संरचनात्मक बदलाव देखा गया है।

ज्वेलरी बनाम निवेश

2026 की पहली तिमाही में ज्वेलरी की मांग 19% घटकर 66 टन रह गई, जबकि पिछले साल यह 81 टन थी। वहीं, निवेश (बार, कॉइन, ETF) की मांग 54% बढ़कर 82 टन हो गई, जो पिछले साल 53 टन थी।

निवेश में रिकॉर्ड उछाल

बार और कॉइन पर होने वाला खर्च 142% बढ़कर 941 अरब रुपए पर पहुंच गया। गोल्ड ETF में निवेश ने तो सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए और इसमें 436% की भारी वृद्धि के साथ 300 अरब रुपए का निवेश हुआ।

केस स्टडी: सोने से बनी करोड़ों की संपत्ति

इस बदलते ट्रेंड को समझने के लिए कुछ वास्तविक उदाहरण महत्वपूर्ण हैं।

केस स्टडी 1: 2 किलो सोना बना 8 करोड़ की संपत्ति का आधार

अहमदाबाद के एक मारवाड़ी परिवार ने 2017 में लगभग 2 किलो सोना बेचने के बजाय उस पर गोल्ड लोन लिया। इस पूंजी से उन्होंने जमीन खरीदी। पिछले नौ वर्षों में न केवल जमीन का मूल्य कई गुना बढ़ा, बल्कि सोने की कीमत भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। आज उनकी दोनों संपत्तियों का संयुक्त मूल्य 8 करोड़ रुपये से अधिक है। वित्तीय सलाहकार इसे 'एसेट लीवरेज' का एक सफल उदाहरण मानते हैं।

केस स्टडी 2: दादी के गहनों से खरीदा पहला घर

मुंबई के एक युवा दंपती ने विरासत में मिले पारंपरिक सोने के गहनों को बेचकर करीब 20 लाख रुपए जुटाए। उन्होंने इस राशि का उपयोग नवी मुंबई में अपने पहले घर की डाउन पेमेंट के लिए किया। अधिक डाउन पेमेंट की वजह से उनकी मासिक होम लोन EMI लगभग 20 हजार रुपए कम हो गई। उनका मानना है कि सालों से लॉकर में बंद गहनों की तुलना में अपना घर उनके लिए कहीं अधिक उपयोगी और बेहतर निवेश साबित हुआ है।

*Edit with Google AI Studio

← पूरा आर्टिकल पढ़ें (Full Version)